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-उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों पर जताई चिंताफोटो
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Iमौसम के बदले पैटर्न से तापमान में भी असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में आने वाले दस सालों में सामान्य तापमान में .5 डिग्री की बढ़ोतरी हो सकती है। यह बातें शुक्रवार को क्लाइमेट ट्रेंड्स की ओर से उत्तराखंड पर जलवायु परिवर्तन और इसके बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और सतत विकास विषय पर आयोजित कार्यशाला में वक्ताओं ने कहीं।
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Iराजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित कार्यशाला में वक्ताओं ने उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन के खतरों के बीच सतत विकास पर विस्तार से चर्चा की। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एसके पटनायक ने कहा, जलवायु परिवर्तन पर बात किए बिना ना कोई नीति बन सकती है और न ही कोई देश या समाज विकास कर सकता है। मुख्य वन संरक्षक कपिल कुमार जोशी ने कहा, कानून और नियमों का पालन करने के साथ इनके प्रति जागरूक होना बहुत जरूरी है। वहीं, मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह ने कहा, मौसम के पैटर्न में बदलाव देखा गया है। उत्तराखंड में अधिकतम और न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी हुई है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. कालाचंद साईं ने कहा, मसूरी और नैनीताल के लिए भूस्खलन संवेदनशील है। इसके अलावा अन्य वक्ताओं ने भी जलवायु परिवर्तन पर चिंता जताई।
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बदलती जलवायु पारिस्थितिकी तंत्र को कर रही प्रभावित
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Iवक्ताओं ने कहा, तेजी से बदलती जलवायु परिस्थितियां पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही हैं। जिसके चलते ग्लेशियर का तेजी से पिघलना, बढ़ता तापमान, वर्षा के बदलते पैटर्न, सूखती नदियां, बाढ़, जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। कहा, राज्य अपनी अर्थव्यवस्था को चार स्तंभों आधारभूत संरचना, पर्यटन, जलविद्युत और कृषि पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन ये सभी स्तंभ जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।
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Iप्राकृतिक आपदाओं में हुई चार गुना वृद्धि
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Iसंस्था ने अपने अध्ययन में दावा किया गया है कि उत्तराखंड के 85 फीसदी जिले जिनकी आबादी 90 लाख से अधिक है, वह प्राकृतिक आपदा जैसे बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन जैसे खतरों के मुहाने पर खड़े हैं। प्रदेश में 1970 के बाद से ऐसी घटनाओं में चार गुना वृद्धि हुई है। राज्य के चमोली, हरिद्वार, नैनीताल, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिला प्राकृतिक आपदा के प्रति सबसे संवेदनशील है। वहीं, इस अवधि के दौरान राज्य में सूखे में दोगुनी वृद्धि हुई है। राज्य के 69 प्रतिशत से अधिक जिलों में सूखे का खतरा मंडरा रहा था। इस अध्ययन के अनुसार पिछले दशक में अल्मोडा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जिले में बाढ़ और सूखे की स्थिति एक साथ देखने को मिली है। इस साल भारत में मानसून के चार महीने की अवधि के दौरान भारी बारिश और बाढ़ की 544 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से उत्तराखंड में 68 मौसमी घटनाएं देखी गईं, जो देश के तीन प्रदेशों में से सबसे ज्यादा हैं।I