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Iशुक्रवार से वेल्हम बॉयज स्कूल में शुरू हुआ क्राइम लिटरेचर फेस्टिवलI
संजीदगी से की गई क्राइम रिपोर्टिंग भी समाज को दिशा दिखाती है। कहीं न कहीं लोग अपराध की खबरों को पढ़कर जागरुक होते हैं और अपराध से बचते हैं। यह बातें क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल के सत्र क्राइम रिपोर्टिंग कितनी कारगर, कितनी खतरनाक सत्र में वक्ताओं की चर्चा में निकलकर सामने आईं। देश का पहला क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल शुक्रवार को वेल्हम बॉयज स्कूल में शुरू हुआ, जिसका उद्घाटन हंस फाउंडेशन की माता मंगला ने किया। फेस्टिवल के पहले दिन तीन सत्र आयोजित किए गए। इनमें वक्ताओं ने कई गंभीर मुद्दों पर चर्चा की।
फेस्टिवल का पहला सत्र एडाप्टिंग एंड बीइंग एडाप्टेड विषय पर हुआ। इसमें शूट आउट एट वडाला के निर्देशक संजय गुप्ता और एस हुसैन जैदी ने चर्चा की। सत्र के संचालक के रूप में मानस लाल उपस्थित रहे। इस दौरान अपराध उपन्यासों को सिनेमाई कृतियों में बदलने की प्रक्रिया को बताया गया। दूसरा सत्र बहुचर्चित क्राइम सस्पेंस फिल्म कहानी और कहानी-टू के निर्देशक सुजॉय घोष के नाम रहा। उन्होंने सस्पेक्ट एक्स में फिल्मी दुनिया के विभिन्न आयामों के विषय से पाठकों को रूबरू कराया। इस सत्र में डॉ. रूबी गुप्ता ने संचालन किया। इसके बाद तीसरा सत्र क्राइम रिपोर्टिंग कितनी कारगर, कितनी खतरनाक विषय पर हुआ। इसमें वक्ताओं के रूप में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी आलोक लाल, डीजीपी अशोक कुमार और पत्रकार शम्स ताहिर खान ने चर्चा की। संचालन विनीत श्रीवास्तव ने किया।
चर्चा में डीजीपी अशोक कुमार ने कहा कि पत्रकारिता का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है क्राइम रिपोर्टिंग। इसका समाज से सीधा जुड़ाव होता है। ऐसे में यदि संजीदगी से क्राइम रिपोर्टिंग होती है तो वह समाज को सतर्क करने का भी काम करती है। मसलन, अपराध किस तरह हुआ क्या उस वक्त लापरवाही रहीं। पुलिस ने किस तरह से अपराधियों को पकड़ा यह सब इसमें बताया जाता है। इससे समाज को अपराध से बचने का तरीका भी मालूम पड़ता है। लेकिन, जब इसमें जबरदस्ती की सनसनी फैलाई जाती है तो इससे पुलिस के साथ-साथ आमजन को भी परेशानी होती है। सनसनी की इसी बात को पूर्व डीजीपी आलोक लाल ने आगे बढ़ाया। उन्होंने पहले सकारात्मक रिपोर्टिंग की बात को अपने एसपी बाराबंकी रहते कार्रवाई का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि उस वक्त उन्होंने 13 क्विंटल हेरोइन पकड़ी थी। यह अब तक का सबसे बड़ी कार्रवाई है। उस वक्त मीडिया ने इसे बहुत अच्छी कवरेज दी। इससे पुलिस का मनोबल बढ़ा। लेकिन, एक दिन उन्होंने एक पत्रिका में देखा कि इसी कहानी को बेहद नकारात्मक तरीके से लिखा गया। उसमें पुलिस कप्तान पर ही सवाल उठा दिए गए। इसी तरह पत्रकार शम्स ताहिर खान ने कहा कि कई बार तमाशा बहुत गलत प्रभाव डालता है। उन्होंने देश के कई बड़े अपराध के वक्त की विभिन्न चैनलों और सोशल मीडिया की रिपोर्टिंग का जिक्र किया, जिसमें केवल तमाशा ही हो रहा था। कई जगह इसे केवल टीआरपी के लिए ही किया जाता है। कहा, सकारात्मक पत्रकारिता जरूरी नहीं है बल्कि जरूरी है कि क्या हो रहा है क्यों हो रहा है इसे बिल्कुल पारदर्शिता से दिखाना। क्राइम रिपोर्ट को भी वॉच डॉग की तरह रहना चाहिए।