इस प्रजाति को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. वेंकटेश केटी ने बताया कि इसमें कार्वाक्रॉल (पत्तियों में पाया जाने वाला रसायन) की मात्रा 53 से 63 फीसदी तक है। यह ऑरिगेनो पिज्जा-पास्ता समेत कई खाद्य सामग्री में बतौर टॉपिग्स इस्तेमाल होता है। अभी बाहरी देशों से इसका आयात होता है। देश में इसकी कोई देसी प्रजाति नहीं थी, जो व्यावसायिक आधार पर उगाई या बेची जा सके।
सीमैप के वैज्ञानिक छह वर्षों से इस पर शोध कर रहे थे। वैज्ञानिकों का दावा है कि स्वदेशी ऑरिगेनो प्रचलित प्रजातियों से अधिक दमदार है और इसकी उपज प्रचलित प्रजातियों से 10-15 प्रतिशत तक अधिक होगी। टीम हेड डॉ. वेंकटेश केटी के नेतृत्व में डॉ. आरसी पडलिया, डॉ. आरएस वर्मा, डॉ. तृप्ता झांग, डॉ. आरके उपाध्याय और डॉ. दिपेंद्र कुमार आदि वैज्ञानिकों का विशेष योगदान रहा।
किसानों के लिए मुफीद सिम-सुदीक्षा प्रजाति
- पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी पैदावार की संभावनाएं अधिक हैं।
- फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है
- जानवर नहीं खाते हैं लिहाजा किसानाें के लिए भी मुफीद
- तेल की मात्रा अधिक व चार माह में फसल तैयार होती है।
सिम सुदीक्षा की पौध नर्सरी में कटिंग के जरिये तैयार कर सकते हैं। अक्तूबर में पौध तैयार की जाएगी और दिसंबर में खेतों में लगाया जाएगा। ऑरिगेनो का तेल एंटी फंगल, एंटी बैक्टीरियल, एंटी ऑक्सीडेंट और इंसेंक्टिसीडल है। इसका इस्तेमाल फ्लेवर और फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में किया जाता है। इसकी सूखी पत्तियों का इस्तेमाल मसाले, टॉपिंग्स या हर्बल टी में इस्तेमाल होता है। -डॉ. वेंकटेश केटी, वैज्ञानिक सीमैप, पंतनगर