भारत-चीन सीमा पर आईटीबीपी और सेना के जवान मुस्तैद हैं, लेकिन नीती घाटी में निवास करने वाले भोटिया जनजाति के ग्रामीण भी पीछे नहीं। वह भी सैनिकों की हौसला आफजाई के लिए घाटी में ही डटे हुए हैं। नीती, गमशाली और मलारी जैसे गांवों के लोग फिलहाल गांव नहीं छोड़ना चाहते। बता दें कि नीती घाटी के ग्रामीण शीतकाल में छह माह तक जिले के निचले क्षेत्रों में रहते हैं।
दर्जनभर गांव आबाद, ग्रामीण बोले-सेना के साथ
जोशीमठ से करीब 85 किलोमीटर दूर नीती घाटी में करीब दर्जन भर गांव इन दिनों आबाद हैं। घाटी के 76 वर्षीय नारायण सिंह का कहना है कि राजमा, आलू, और चौलाई की बुआई का कार्य पूरा कर दिया गया है।
इसके बावजूद निचले क्षेत्र में वह नहीं जा रहे। गमशाली गांव निवासी 40 वर्षीय चंद्रमोहन फोनिया जोशीमठ में होटल का संचालन करते हैं। वह कहते हैं व्यवसाय और नौकरी देश से बढ़कर नहीं है। बताते हैं कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में हमारे परिजन सेना की मदद के लिए घोड़े-खच्चर लेकर सीमा पर गए थे और करीब चार से पांच माह वहीं रहे थे। हम भी सेना के साथ हैं।