ये हैं कुछ अन्य तरीके
- फिशिंग : ठग नकली ईमेल या संदेश भेजते हैं, जो वैध स्रोत से प्रतीत होते हैं। संवेदनशील जानकारी जैसे कि पासवर्ड या क्रेडिट कार्ड नंबर मांगते हैं।
- सोशल इंजीनियरिंग : मनोवैज्ञानिक तरीकों से पीड़ितों को धोखा देते हैं। उन्हें गोपनीय जानकारी देने या कुछ कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करते हैं।
- नकली वेबसाइट्स : वैध वेबसाइट्स की नकल करते हैं, लॉगिन क्रेडेंशियल या वित्तीय जानकारी चोरी करते हैं।
- ऑनलाइन नीलामी धोखाधड़ी : साइबर ठग ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर विक्रेता बनते हैं। गैर-मौजूद या कम-मूल्य की वस्तुओं के लिए भुगतान लेते हैं।
- रोमांस स्कैम : नकली रिश्ते बनाते हैं, विश्वास हासिल करने से पहले पैसे या व्यक्तिगत जानकारी मांगते हैं।
- निवेश स्कैम : असामान्य रूप से उच्च रिटर्न का वादा करते हैं, अक्सर नकली कंपनियों या योजनाओं के साथ।
- मैलवेयर और रैनसमवेयर : डिवाइस तक पहुंच प्राप्त करने या उन्हें लॉक करने के लिए दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं। बहाली के लिए भुगतान मांगते हैं।
- सिम स्वैपिंग : पीड़ित के फोन नंबर को नए सिम कार्ड में स्थानांतरित करते हैं। उनके खातों और व्यक्तिगत जानकारी तक पहुंच प्राप्त करते हैं।
- विशिंग (वॉइस फिशिंग) : फोन कॉल करते हैं। संवेदनशील जानकारी चोरी करने के लिए वैध संगठन से होने का दावा करते हैं।
- स्मिशिंग (एसएमएस फिशिंग) : नकली लिंक या प्रॉम्प्ट के साथ संदेश भेजते हैं, गोपनीय जानकारी देने के लिए प्रेरित करते हैं।
- ऑनलाइन कमाई : टास्क पूरे करने पर थोड़ी कमाई कराई जाती है। इसके बाद बड़े टास्क के लिए लाखों रुपये अपने खातों में जमा करा लिए जाते हैं।
पकड़े तो जाते हैं, मगर नहीं होती रिकवरी
पुलिस साइबर ठगों को गिरफ्तार तो करती है, लेकिन उनसे कोई रिकवरी नहीं करा पाती। यानी आपकी जीवनभर की कमाई ठगों के पास चली तो जाती है, लेकिन इसे वापस पाने का कोई तरीका नहीं है। इसका कारण है कि ठग पहले ही इस रकम को इधर-उधर खर्च कर देते हैं। जब तक पुलिस इन तक पहुंचती है, तब तक सारी रकम खत्म हो जाती है।