वरिष्ठ नौकरशाह डॉ. उमाकांत पंवार को आईएएस पद से वीआरएस लिए करीब एक पखवाड़ा बीत गया है, मगर उन्होंने असमय वीआरएस क्यों लिया? यह सवाल सचिवालय के गलियारों में ही नहीं बड़े नौकरशाहों, कुछ मंत्रियों और तमाम प्रभावशाली लोगों के बीच आज भी चर्चा का विषय है। जितने मुंह हैं, उतनी बातें हैं, पहला सवाल, अरे! अभी तो उनके रिटायरमेंट में नौ साल बाकी थे, फिर ऐसा क्यों किया ? बात तो कोई खास है, ही।
नौकरशाहों, सत्ता के गलियारे की हर खबर की भनक रखने वाले भी इन सवालों पर कुछ बोलते नहीं, मुंह सिए हुए, भेद भरी मुस्कान के साथ वह कुछ ऐसा इंप्रेशन देते हैं, जैसे वह जानते तो सब कुछ हैं, मगर बात जुबान पर नहीं लाएंगे। वीआरएस का रहस्य जानने में उन लोगों की भी दिलचस्पी है, जो खुद के तार दिल्ली में पीएमओ तक से जुड़ा होने का दावा करते हैं। अमर उजाला ने जवाब के लिए गली-गली घूमने की बजाए यह सवाल पंवार से ही कर लिया, वे बोले-अपने करियर को लेकर ये मेरा रणनीतिक कदम है।
सचिवालय और सूबे की सियासत में पंवार अभी भी सबसे हॉट इश्यू हैं। चर्चा किसी भी मुद्दे पर हो, आखिर में ठहरती पंवार के वीआरएस पर जाकर ही है। हर एक की जुबान पर एक ही सवाल है, ‘कोई बताएगा, पंवार ने नौकरी क्यों छोड़ी?’ पंवार ने तीन अगस्त को वीआरएस के लिए आवेदन किया और 10 अगस्त को यह मंजूर भी हो गया। गलियारों में यह सवाल भी तैर रहा है कि जब वीआरएस के लिए 90 दिन पहले आवेदन करने का कायदा है तो पंवार के मामले में छूट क्यों दी गई? 1991 बैच के आईएएस अफसर रहे पंवार ने जब स्वेच्छा से सेवा छोड़ी उस समय उनकी सेवा के पूरे नौ साल शेष थे।
इन नौ वर्षों में वह नौकरशाही के शीर्ष, मुख्य सचिव के ओहदे तक पहुंच सकते थे। केंद्र में सचिव बन सकते थे। जिस ओहदे पर पहुंचना हर आईएएस का सपना होता है, उसमें पंवार की दिलचस्पी न होना ही इन सवालों के पैदा होने का सबसे बड़ा कारण है। पंवार ने नौकरी छोड़ने के बाद उत्तराखंड स्टेट सेंटर फॉर पब्लिक पालिसी एंड गुड गवर्नेंस के निदेशक/ मुख्य कार्यकारी पद को स्वीकारा, जो प्रमुख सचिव नियोजन के दायरे में है। पंवार तो पहले से ही इस ओहदे पर थे। खुद पंवार की बिरादरी से जुड़े अफसर सवाल कर रहे हैं कि उन्हें सीईओ बनने की जरूरत क्या थी?
कोई कह रहा है कि पंवार त्रिवेंद्र सरकार की‘गुड बुक’से बाहर थे और ऊर्जा विभाग से हटा दिए जाने से असहज थे। ऊर्जा निगम के कथित भ्रष्टाचार पर पंवार की लंबी चुप्पी को भी वीआरएस से जोड़कर देखा जा रहा है। सत्ता और सियासत में दखल रखने वाले कुछ लोग तो पंवार की संपत्ति का हिसाब-किताब तक जोड़ रहे हैं। कोई उनकी वीरआएस को ‘सेफ एक्जिट’बता रहा है तो कोई दावा कर रहा है कि पीएम मोदी की आंखों में जो आईएएस खटक रहे हैं, उनमें एक नाम पंवार भी थे। पंवार के वीआरएस का रहस्य जानने में नौकरशाहों, सचिवालयकर्मियों की तरह राजनेताओं की भी दिलचस्पी है।
एक कैबिनेट मंत्री तो खुद हैरान थे और उन्होंने पंवार की वीआरएस की वजह जाननी चाही। पीएमओ को राजकाज की सूचना भेजने का दावा करने वाले एक राजनेता ने भी इस संवाददाता से जानना चाहा कि पंवार ने वीआरएस क्यों लिया? हद तो तब हो गई, जब यही सवाल केंद्रीय खुफिया विभाग से जुड़े एक जिम्मेदार शख्स ने कर दिया। हमारे पास तो इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तो है नहीं। युधिष्ठर कहां से लाएं। अब इस प्रश्न का जवाब या तो पंवार जानते हैं, या फिर आने वाला वक्त। पंवार ने क्या कहा, आप भी पढ़ लीजिए...
मैंने वीआरएस अपने करियर को ध्यान में रखकर ही लिया है। लोक नीति एवं सुशासन सेंटर के सीईओ की जिम्मेदारी काफी है। मैं इसे तरक्की के रूप में देख रहा हूं। पारिवारिक कारणों की वजह से भी मैंने वीआरएस लिया है।
- डॉ. उमाकांत पंवार, पूर्व आईएएस, सीईओ, लोक नीति एवं सुशासन केंद्र