विशेषज्ञों ने रखी मन की बात
उत्तराखंड में 64 फीसदी वन क्षेत्र है और 1500 ग्लेशियर हैं। इन अनुपम धरोहरों को संरक्षित कर प्रकृति, प्राण और प्राणी के हिसाब से विकास योजनाएं बननी चाहिए। साथ ही वनों को आग से बचाने के लिए सामूहिक भागीदारी होनी चाहिए। इस वर्ष फायर सीजन में उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग से 50 फीसदी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुआ जो किसी भी स्तर पर शुभ नहीं है। भूटान की तर्ज पर हमें भी भारत को कार्बन न्यूट्रल देश बनाने के लिए एकजुट होकर प्रयास करने होंगे।
- देव राघवेंद्र सिंह चौधरी, पर्यावरण विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता, रुद्रप्रयाग।
विकास के नाम पर हिमालय की तलहटी को कंक्रीट का जंगल बनाया जा रहा है जो वहां के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। बीते एक दशक में देखे तो केदारनाथ क्षेत्र में मंदाकिनी नदी के दोनों तरफ भूस्खलन बढ़ा है जिसे रोकने के लिए सार्थक प्रयास होने चाहिए। माटी की परत को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न प्रजाति के पौधों और जड़ी-बूटी का रोपण कर उनका संरक्षण प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।
- चंद्र सिंह नेगी, पर्यावरण एवं आध्यात्म प्रेमी, अगस्त्यमुनि
क्षमता से अधिक किसी वस्तु, स्थान का उपयोग होगा तो उसके परिणाम भयानक ही होंगे। यही, हिमालय और उसके प्राकृतिक संसाधनों के साथ हो रहा है। पर्यटन व तीर्थाटन के नाम पर पहुंच रही भीड़ प्रकृति को जिस तरह से रौंद रही है वह हिमालय और हिमालयवासियों के लिए बड़ा संकट बन रही है। पहाड़, जलधारे और पर्वतों को नजदीक से समझकर उन्हें उनके वास्तविक रूप में रहने से ही पर्यावरण संरक्षण होगा। हमने 2013 की केदारनाथ आपदा से भी सबक नहीं लिया है। कार्बन का उत्सर्जन कम से कम हो, इसके लिए सार्वजनिक वाहन व्यवस्था को बढ़ावा देना होगा।
-डा. वीर विक्रम भारती, सहायक प्राध्यापक डिग्री कॉलेज रुद्रप्रयाग
हिमालय को बचाने के लिए हमें स्वयं को बदलना होगा। छोटी-छोटी कोशिशों से घर के आंगन से स्कूल परिसर, रास्तों व खेतों को हरियाली से जोड़ना होगा। पुराने पौराणिक जलस्रोतों का जीवंत करने के लिए बंजर खेतों को आबाद करने के लिए वृक्ष खेती अपनानी होगी। हमें पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन की जानकारी तो है लेकिन हम इसे लेकर जीना नहीं चाहते हैं। हिमालय से लगे गांवों से पलायन न हो इसके लिए ठोस हिमालय नीति बनानी होगी।
- महावीर सिंह जगवाण, आजीविका व पर्यावरण के जानकार, तिलवाड़ा (रुद्रप्रयाग)
छात्र-छात्राओं के सुझाव
गाड़-गदेरों, नदियों का निरंतर बहाव बना रहे। इसके लिए स्थानीय स्तर पर मिलकर कार्य करने की जरूरत है। साथ ही कूड़े-कचरे के प्रबंधन के लिए घर से ठोस पहल होनी चाहिए, तभी सही अर्थों में हिमालय को बचाया जा सकता है।
- अदिति, कक्षा 9
जल, जंगल और जमीन का सद्पयोग ही पर्यावरण संरक्षण है। विदेशों की योजनाएं और नीतियों के बजाय स्थानीय हालातों और संभावनाओं को ध्यान में रखकर विकास योजनाएं बनाई जानी चाहिए। साथ ही उस विकास योजना से प्रकृति और उसके घटकों को कितनी क्षति पहुंच रही है, उसकी पूर्ति के लिए भी एक समयसीमा तय होनी बहुत जरूरी है।
- प्रिंस, कक्षा 12