दिवाली के दौरान पटाखों से निकलने वाले रासायनिक धुएं से हर साल करीब एक हजार बच्चे बीमार होते हैं। इनमें से दो से तीन बच्चे में अस्थमा के लक्षण भी मिल रहे हैं। कई बच्चों को लंबे इलाज और एहतियात बरतने के बाद बीमारी से राहत मिल जाती है। लेकिन अस्थमा के लक्षणों से ग्रस्त बच्चों को लंबे समय तक परेशानी झेलनी पड़ती है।
दिवाली का त्योहार अभी चार दिन दूर है। लेकिन कॉलोनियों और मोहल्लों में पटाखों का शोर सुनाई दे रहा है। पटाखों से पैदा होने वाले प्रदूषण से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। लेकिन इनसे निकलने वाला धुआं हवा को भी प्रदूषित कर देता है। इस रासायनिक धुएं से सबसे अधिक सांस के रोगियों और बच्चों को नुकसान पहुंचता है।
उप जिला अस्पताल की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मंजू राणा बताती हैं कि हर साल दिवाली के दौरान खांसी, गले में दर्द, बलगम बनना और सांस में तकलीफ जैसे रोगों के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि पिछले साल दिवाली के त्योहारी सीजन के दौरान ओपीडी में रोजाना 35 से 40 बच्चे पहुंच रहे थे।
करीब एक महीने तक रोजाना धुएं से बीमार हुए बच्चों के अस्पताल आने का सिलसिला जारी रहा। सभी बच्चे सांस के रोगों से पीड़ित थे। बताया कि तब अस्थमा जैसे लक्षणों वाले तीन बच्चों को रेफर भी किया गया था। ये सभी बच्चे पटाखों के धुएं से बीमार हुए थे। बताया कि हर साल दिवाली के आसपास का एक महीना ऐसा होता है जब ओपीडी में आधी संख्या केवल धुएं से बीमार होकर आने वाले बच्चों की होती है।
Iग्रीन दिवाली मनाएं : डॉ. मंजूI
डॉ. मंजू राणा ने बताया कि पटाखों में पोटेशियम नाइट्रेट (कलमी शोरा) और सल्फर (गंधक) है। वहीं इसमें लेड (सीसा), क्रोमियम, मरकरी (पारा) और मैग्नीशियम जैसे धातु भी होते हैं। इनके जलने से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैस निकलती है।
उन्होंने बताया ये सभी गैस श्वसन तंत्र के लिए बेहद खतरनाक होती है। इससे खांसी, गले में दर्द, बलगम आदि की परेशानी होती है। गले में इरिटेशन के साथ खांसी लगातार होती है और बलगम भी बनता है। अगर समय पर उपचार नहीं किया जाता है तो अस्थमा जैसे लक्षण आने लगते हैं। उन्होंने बताया कि इस तरह की हालात न बने इसलिए ग्रीन दिवाली मनाएं।