कॉल सेंटर बंद हो जाने के बाद आरोपी वर्चुअल नंबरों से लोगों को कॉल करता था। इससे लगता था कि यह नंबर स्थानीय है, लिहाजा लोग आसानी से फोन उठा लिया करते थे। पूछताछ में उसने बताया कि इन सब में उसका लाखों रुपये महीने का खर्च होता था।
ऐसे देते हैं घटना को अंजाम
आरोपी व उसके साथी अमेरिका के नागरिकों के कंप्यूटरों पर फर्जी वायरस भेजते थे और फिर खुद को विभिन्न कंपनियों का प्रतिनिधि बताकर इस वायरस को हटाते थे। इसके बाद एचपी, डैल, कैनन, लैक्समार्क कंपनियों के टेक्नीशियन के नाम से सर्विस प्रोवाइडर के रूप में पैसे प्राप्त करते थे। विदेशी कस्टमर का नंबर आरोपी के साथी उपलब्ध कराते थे। उसका कोलकाता का रहने वाला एक साथी गेटवे के माध्यम से संबंधित कस्टमर से धनराशि प्राप्त करता था। अभियुक्त एवं उक्त साथियों के मध्य सारा लेनदेन उनके बैंक खातों से होता था।
अमेरिका में भारतीय हो रहे बदनाम
पूरी दुनिया में नाइजीरिया के ठग साइबर ठगी के लिए बदनाम हैं। भारत में भी हर साल सैकड़ों लोगों को अब तक पकड़ा जा चुका है, लेकिन अमेरिका में अब इस काम के लिए भारतीयों का नाम खराब हो रहा है।