उत्तराखंड में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट महेश चंद्र कौशिवा ने फर्जी डिग्री के जरिये श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति पाने के मामले में दोषी को पांच साल कारावास और पांच हजार जुर्माने की सजा सुनाई है।
मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे शासकीय अधिवक्ता दिग्पाल सिंह नेगी और श्रद्धा रावत ने बताया कि डा. केपी सिंह पुत्र रण बहादुर सिंह ने एक सितंबर 2011 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय आयुर्विज्ञान शोध संस्थान श्रीनगर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यभार ग्रहण किया था।
ओरिजिनल कापी प्रस्तुत नहीं की
कार्यभार ग्रहण करते वक्त डा. केपी सिंह की तरफ से मेडिकल कॉलेज में अपनी डिग्री की डुप्लीकेट कापी जमा की गई थी। इस दौरान मेडिकल कॉलेज प्रशासन की मांग पर डिग्री की ओरिजिनल कापी प्रस्तुत नहीं की जा सकी।
कुछ समय बाद माइक्रोबायोलॉजी की विभागाध्यक्ष डा. नीलम शर्मा ने डा. केपी सिंह की डिग्री पर संदेह जताया तो तत्कालीन प्राचार्या डा. स्नेहलता सूद ने मामले की जांच के लिए शासन को पत्र लिखा था। इस बीच कॉलेज प्रशासन की तरफ से जांच कराई गई तो डिग्री फर्जी पाई गई।
420 के तहत दोषी
12 जून 2012 को मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य डा. वीएल जहागिरदार ने श्रीनगर पुलिस को तहरीर देकर डा. केपी सिंह पर फर्जी डिग्री के आधार पर मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति पाने का आरोप लगाया था। आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ताओं ने बताया कि इस मामले में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने डा. केपी सिंह को धारा 420 के तहत दोषी पाया। अदालत ने इस मामले में दोषी को पांच साल कारावास और पांच हजार जुर्माने की सजा सुनाई है। डा. केपी सिंह मूल रुप से रायबरेली उत्तर प्रदेश का रहने वाला है और तब देहरादून के भानियावाला में किराए पर रहता था।