मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने के नाम पर राजधानी में सक्रिय ठगों को गिरफ्तार कर पुलिस भले ही अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन मामले में लीपापोती भी सामने आ रही है।
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बुधवार सुबह तक गिरफ्तार किए गए आरोपितों से करीब 35 लाख रुपये तक की बरामदगी की चर्चाएं थीं, लेकिन दोपहर होते-होते यह रकम दो लाख रुपये पर सिमट गई। नेहरू कॉलोनी पुलिस बता रही है कि आरोपितों से केवल दो लाख रुपये मिले हैं, जबकि हालात और सूत्र कुछ और ही इशारा कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, मामले में एसओजी की भूमिका संदिग्ध है। बताया जा रहा है कि एसओजी की टीम करीब सप्ताह भर से मेडिकल पीजी कोर्स में दाखिले दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह पर निगाह रखे थी। कहा यह भी जा रहा है कि एसओजी ने इस दौरान छापा मारकर ठगों से पैसे भी वसूले। साथ ही ठगों को यह कहकर धमकाया कि मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया जाएगा।
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मेडिकल सीट के नाम पर ठगी करने वाले चार गिरफ्तार
मंगलवार को भी यही खेल चल रहा था, कि इसकी भनक मीडिया को लग गई और मामला खुल गया। मामला मीडिया में आने के बाद बुधवार को पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया। बुधवार को ही पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार दिखाया है।
गिरफ्तार आरोपितों की पहचान राजीव राणा, रतीश नेगी, सुधाकर नेगी, सुरजीत नेगी के रूप में हुई। सभी को कोर्ट के आदेश से जेल भेजा गया।
थाना नेहरू कॉलोनी से मिली जानकारी के मुताबिक जौलीग्रांट मेडिकल कॉलेज में दाखिले के नाम पर ठगी की जा रही थी। पुलिस की कहानी के मुताबिक रतीश नेगी निवासी जोगीवाला, राजीव राणा निवासी दिल्ली, सुरजीत सिंह निवासी गाजियाद तथा सुधाकर नेगी निवासी बद्रीपुर ने साजिश रची।
आरोपितों ने तेलंगाना निवासी लक्कम दीक्षापति से दाखिले के नाम पर पैसे ठगे। पुलिस के मुताबिक रतीश नेगी ने खुद को संस्थान का चेयरमैन होने का दावा किया और कॉलेज में दाखिले का वादा भी किया।
एक बनता है कॉलेज का डायरेक्टर तो दूसरा पीए
सभी शातिर देहरादून में मौजूद एक बड़े मेडिकल कॉलेज के प्रबंधन का किरदार निभाते थे। रतीश नेगी निवासी बद्रीपुर कॉलेज का प्रबंध निदेशक बनता था जबकि सुधाकर नेगी प्रबंध निदेशक का पीए। सुरजीत सिंह सहायक के रूप में आगे-पीछे रहता था और राजीव राणा पूरे गेम का मास्टर माइंड है।
करोड़ों में बिकती है पीजी की सीट मेडिकल कालेज में पोस्ट ग्रेजुएट की एक सीट करोड़ों रुपयों में बिकती है। सूत्रों के अनुसार, गाइनोलॉजी, न्यूरो सर्जन, रेडियेशन आंकलॉजी, ईएनटी समेत कई ऐसे पीजी कोर्स में 3 से 7 करोड़ लिए जाते हैं।
सबसे कम फीस नेत्र विशेषज्ञ के कोर्स के लिए 90 लाख रुपये है। बताया जा रहा है कि ये फीस मेडिकल कॉलेज दस्तावेजों में नहीं दिखाते। सभी सीटें दलाल के माध्यम से बिकती हैं।
बताया जा रहा है कि मेडिकल की सीट दिलाने के आरोप में पकड़े गए लोग 40 से 50 लाख रुपये ले रहे थे। यह बात इसीलिए विश्वसनीय नहीं लग रही है। 30 से 40 लाख रुपये तक की बोली तो एमबीबीएस की सीटों के लिए लगती है, जबकि पीजी की सीटों की बोली एक करोड़ से ऊपर जाती है।
एक ओर मेडिकल कॉलेज में पीजी की सीटों के लाखों, करोड़ों रुपये में बिकने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी ओर पुलिस ने मेडिकल कॉलेज में दाखिले के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह से केवल दो लाख रुपये बरामद होने की बात बताई है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कहीं बीच में कोई गेम तो नहीं हुआ? क्योंकि लाखों-करोड़ों में सीटों की डील करने वालों के पास दो लाख रुपये बरामद होना विश्वसनीय नहीं लग रहा है।
पहले हो चुकी है हत्या दून में मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलाने का बड़ा नेटवर्क सक्रिय रहा है। दो साल पूर्व एक काबीना मंत्री के पूर्व पीआरओ की एमबीबीएस सीट की दलाली में हत्या कर दी गई थी। उस समय बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ था। कोई भी नेटवर्क केवल दून में नहीं, बल्कि उत्तरी भारत में स्थित मेडिकल कॉलेज में सक्रिय रहता है।