फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रेलवे में नौकरी दिलाने के नाम पर रेलवे 'अधिकारी' से बड़ी ठगी

Mon, 26 Oct 2015 01:51 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
देहरादून पुलिस ने उत्तर रेलवे में विभिन्न पदों पर नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह के मास्टर माइंड समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया है।
विज्ञापन


डीआरएम के कथित पीए समेत चार लोग फरार हैं। गिरोह दून के रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी के परिवार के नौ लोगों से 42 लाख रुपए ठग चुका है। आरोपी डीआरएम आफिस में सर्विस बुक भरवाने और रेलवे अस्पताल में मेडिकल कराने और ट्रेन का पास जारी कर शिकार को फंसाते थे।

गिरोह के पास से रेलवे के अधिकारियों की मुहरों के साथ विभाग के कागजात मिले हैं। पुलिस फर्जीवाड़े में रेलवे अधिकारियों की साठगांठ से इनकार नहीं कर रही है। दून के जीएमएस रोड स्थित रॉक वैली अपार्टमेंट निवासी और रेलवे से रिटायर्ड कर्मचारी शशि प्रसाद बंदूणी ने 10 अक्तूबर को पटेलनगर कोतवाली में तहरीर देकर बताया था कि विजय प्रकाश निवासी सहरसा बिहार उनके संपर्क में आया था।
विज्ञापन


मधुर संबंध होने के बाद विजय ने उनकी बेटी की रेलवे में टिकट कलेक्टर के नौकरी दिलाने का वादा किया। डीआरएम आफिस में भ्रमण के साथ बंदूणी की बेटी की सर्विस बुक आदि भरवा दी गई। स्पीड पोस्ट से कॉल लेटर भेजा गया।

दिल्ली और मुंबई में साक्षात्कार कराने के साथ ज्वाइनिंग लेटर दिया गया। विश्वास होने पर बंदूणी ने दो बेटियों के अलावा दामाद समेत नौ लोगों की भर्ती का तानाबाना बुन लिया। विजय प्रकाश के जरिये सतीश कुमार निवासी गोपालपुर छपरा (बिहार) आदि को 42 लाख रुपए दे दिए।

रकम देने के बाद पता चला कि उनके साथ छल किया गया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद गिरोह की धरपकड़ के लिए एसपी सिटी अजय सिंह की अगुवाई में टीम गठित की गई। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. सदानंद दाते ने रविवार को गिरोह का खुलासा किया।

बताया कि गिरोह के सरगना सतीश कुमार (हाल पता, जय विहार रनोला नई दिल्ली) और नई दिल्ली के पहाड़ गंज निवासी बैद्यनाथ उर्फ विक्की को गिरफ्तार किया गया है। इनके पास से दो लाख रुपए, रेलवे विभाग की नकली मुहरें और विभाग से संबंधित पत्रावली मिली हैं।

गिरोह में शामिल विजय प्रकाश उर्फ सत्यप्रकाश निवासी सहरसा, गोपाल सिंह निवासी मुंगेर, पंकज कुमार निवासी वैशाली (तीनों बिहार) और ओमवीर सिंह यादव निवासी बुलंदशहर यूपी फरार बताए गए हैं। इनकी तलाश में दबिश चल रही है।
विज्ञापन

इस तरह से ठगते थे लोगों को

गिरोह ने ठगी करने के लिए पूरा नेटवर्क बना रखा है। हर सदस्य की अलग जिम्मेदारी थी। विजय प्रकाश और ओमबीर टिकट कलेक्टर, कामर्शियल क्लर्क और चपरासी पद पर नौकरी दिलाने के लिए शिकार तलाश करते हैं। शिकार को पहले सरगना सतीश कुमार से रेलवे अफसर के रूप में मिलाया जाता था।

बैद्यनाथ की जिम्मेदारी दिल्ली आने वाले शिकार को डीआरएम आफिस पहुंचाने की होती है। पहले से वहां मौजूद रहने वाले पंकज कुमार को डीआरएम का पीए बनाकर मिलाया जाता। पंकज संबंधित उम्मीदवार को डीआरएम के आफिस में भ्रमण कराकर कागजी कार्रवाई पूरी कराता है।

रेलवे के पास जारी कराने की जिम्मेदारी गोपाल सिंह संभालता। गोपाल के पिता आरपीएफ में कर्मचारी हैं। बुलंदशहर के ओमबीर सिंह यादव रेलवे अस्पताल में उम्मीदवार का मेडिकल कराता है। इसके बाद शिकार से रकम वसूली जाती।

रकम मिलने के बाद डीआरएम कार्यालय के पते से डाक के माध्यम से चयनित व्यक्तियों के घर ज्वाइनिंग लेटर और दिल्ली तक ट्रेन का पास भेजा जाता। शिकार जब ज्वाइनिंग के लिए पहुंचता है तो सच सामने आ जाता। पीड़ित उन्हें फोन करता है तो नंबर बंद मिलता है।

गिरोह से ऐसे जुड़े पीड़ित
एसपी सिटी अजय सिंह ने बताया कि रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी शशि प्रसाद के यहां बिहार के सहरसा निवासी विजय प्रकाश उर्फ सत्यप्रकाश साल 2013 में कि रायेदार था। बाद में विजय ने बंदूणी के पड़ोस के एक अपार्टमेंट में फ्लैट खरीद लिया।

रिश्ते बनने पर विजय प्रकाश ने अपने संबंधों से बेटियों को रेलवे में नौकरी दिलाने का झांसा दिया। विजय के जरिये वह गिरोह के सरगना सतीश कुमार से मिले।

ऐसे हुआ शक
शशि प्रसाद के परिवार को जालसाजों पर जरा सा भी शक नहीं था। इसकी वजह यह थी कि सब कुछ नियमानुसार हो रहा था। लेकिन जब ट्रेन में सीट आरक्षित कराकर टिकट कलेक्टर की ट्रेनिंग के लिए कोलकाता के एक इंस्टीट्यूट में भेजा गया और वहां इंस्टीट्यूट नहीं मिला इन्हें शक हुआ। इसके बाद इन्होंने रेलवे के अधिकारियों से संपर्क किया तो फर्जीवाड़ा सामने आता चला गया। एक एक कर सभी परतें खुलती चली गईं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें