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केंद्र तय करेगा सिविल सर्विस बोर्ड का गठन सही या गलत

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ब्यूरो/अमर उजाला।
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देहरादून। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद गठित किया गया सिविल सर्विस बोर्ड शासन के गले की फांस बन गया है। इस मामले को जब न्यायालय की अवमानना से जोड़कर देखा गया तो शासन ने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी। कुछ दिन पहले शासन ने केंद्र को पत्र लिखकर बोर्ड पर स्थिति स्पष्ट कर मार्गदर्शन करने की मांग की है। अब केंद्र ही तय करेगा कि उत्तराखंड में बोर्ड का गठन सही है या गलत।
बता दें कि उत्तराखंड में सिविल सर्विस बोर्ड का गठन वर्ष 2014 से लंबित पड़ा हुआ था। अब एकाएक गत आठ अगस्त को इसका गठन कर दिया गया। पांच सदस्यीय इस बोर्ड में चार आईएएस और एक आईपीएस अधिकारी (पुलिस महानिदेशक) हैं। इस बोर्ड का गठन उस समय किया गया जब एनएच-74 भूमि मुआवजा घोटाले में कुछ आईएएस अधिकारियों के नाम सामने आए। ऐसे में इस मामले को आईएएस बनाम आईपीएस से भी जोड़कर देखा गया। चर्चा थी कि आईएएस अधिकारियों ने आईपीएस अधिकारियों को काबू करने को आनन-फानन में बोर्ड का गठन किया है। कुछ दिन बाद ही यह बात भी सामने आई थी कि इस मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इसके गठन पर रोक लगा दी थी। हालांकि, इससे पहले ही कई राज्य सिविल सर्विस बोर्ड का गठन कर चुके थे। सुप्रीम कोर्ट की रोक की बात सामने आते ही शासन में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों के लिए बोर्ड का गठन अब मुसीबत बन गया है। काफी समय तक अधिकारी इसका तोड़ ढूंढने में लगे रहे। गृह विभाग का कहना था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। लिहाजा अब इस बोर्ड के संबंध में केंद्र सरकार को पत्र लिखकर शासन ने मार्गदर्शन करने की मांग की है।
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हमें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की जानकारी नहीं है। इसलिए हमने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इन आदेशों के बारे में पूछा है। अब उसके बाद तय हो पाएगा कि बोर्ड का गठन सही है या गलत।
-आनंद वर्द्धन, प्रमुख सचिव गृह।
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