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उतराखंड ग्रामीण बैंक के मैनेजर पर सीबीआई ने दर्ज किए दो मुकदमे

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उत्तराखंड ग्रामीण बैंक के मैनेजर पर सीबीआई ने दर्ज किए दो मुकदमे
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। फर्जी तरीके से किसानों को करोड़ों रुपये लोन बांटकर धोखाधड़ी के आरोप में बैंक मैनेजर, ट्रैक्टर डीलर और अन्य लोगों के खिलाफ सीबीआई ने दो मुकदमे दर्ज किए हैं। आरोप है कि वर्ष 2014-15 में उत्तराखंड ग्रामीण बैंक की बाजपुर शाखा के तत्कालीन मैनेजर ने ट्रैक्टर डीलर के साथ षड्यंत्र रचकर करीब सात करोड़ रुपये का घोटाला किया है। जिसमें 81 किसानों को केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) लोन दिया गया और उसको मार्जिन के रूप में इस्तेमाल करके एग्रीकल्चर टर्म लोन देना दिखाया गया।
सीबीआई से मिली जानकारी के अनुसार उत्तराखंड ग्रामीण बैंक के महाप्रबंधक सत्यपाल सिंह की शिकायत के आधार पर साल 2014-15 में बाजपुर शाखा के प्रबंधक रहे आरएएस दिनकर और केजीएन ट्रैक्टर एंड इक्युपमेंट व अन्य कई लोगों के खिलाफ दो मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इनमें एक मुकदमा तीन करोड़ 39 लाख 84 हजार रुपये और दूसरा मुकदमा तीन करोड़ 48 लाख 82 हजार रुपये के गबन का है। शाखा प्रबंधक आरएएस दिनकर पर आरोप है कि उन्होंने ट्रैक्टर डीलर के साथ मिलकर पहले मामले में 41 किसानों को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन बांटा गया है। जबकि दूसरे मामले में 40 किसानों को लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये का लोन बांटा गया है। इनके खिलाफ 19 जून को धोखाधड़ी, कूट रचना और एंटी करप्शन एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
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ऐसे किया गया फर्जीवाड़ा
मामले में पहले बैंक ने आंतरिक जांच की थी। जिसके बाद ये मामले सामने आए। जांच में पता चला कि लोन देने के लिए किसानों की फर्जी खतौनी बनाई गईं और उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड के जरिये लोन बांटे गए। इसके बाद इस लोन को ट्रैक्टर या अन्य कृषि यंत्र खरीदने के लिए मार्जिन मनी के तौर पर इस्तेमाल किया गया और उन्हें एग्रीकल्चरल टर्म लोन बांटे गए। जबकि केसीसी केवल फसल उत्पादन के लिए जरूरी बीज व खाद आदि खरीदने के लिए किसानों को दिया जाता है। वहीं टर्म लोन में किसान खुद से मार्जिन मनी बैंक को देता है और उसकी हैसियत के अनुसार उसे टर्म लोन बांटा जाता है।
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किसानों को नहीं मिले उपकरण, लगाई फर्जी रसीदें
जांच में पाया गया जिन उपकरणों को खरीदने के लिए टर्म लोन दिए गए उनकी फर्जी रसीदें और कुटेशन बैंक में जमा की गईं। भौतिक सत्यापन में पाया गया कि कई किसानों को उपकरण दिए ही नहीं गए। यह सारा पैसा बैंक मैनेजर और ट्रैक्टर डीलर ही चट कर गए। इनमें से कई किसान दूसरे बैंकों के डिफाल्टर भी हैं। बैंक ने जब भौतिक सत्यापन किया तो पाया कि कई किसान तो इस समय भूमिहीन हो चुके हैं। कई किसान ऐसे हैं जो खेती ही नहीं कर रहे। जांच में कई और चौंकाने वाली बातें भी सामने आई हैं।

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