50 साल बाद देश विकास के लिए उल्टी दिशा में चल पड़ा है। बैकों आदि बड़ी संस्थाओं का निजीकरण किया जा रहा है। यह आने वाले समय में अधिक घातक हो सकता है।
यह बातें अर्थशास्त्री प्रोफेसर डॉ. एसके त्रिपाठी ने शुक्रवार को बैंकों के राष्ट्रीयकरण की स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में कहीं। कार्यक्रम का आयोजन उत्तरांचल बैंक इम्प्लाइज यूनियन की ओर से किया गया। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री प्राइवेट बैंकों के राष्ट्रीयकरण का अध्यादेश लाई थीं। उस वक्त विरोध भी हुआ, लेकिन बड़े पूंजीपतियों के हाथों से बैंकों की कमान लेने का यह फैसला देश के विकास में सहायक सिद्ध हुआ। सरकारी बैंकों से छोटे कारोबारियों, मजदूरों आदि को भी लाभ मिला। इससे देश में सर्वांगीण विकास हुआ। अब 50 साल बाद फिर से निजीकरण की बयार चल पड़ी है। मौजूदा सरकार देश की महारत्न, नवरत्न कंपनियों को निजी हाथों में देना चाहती है। देश की सबसे बड़ी संस्था रेलवे को भी निजी हाथों में देने की तैयारी है। यह चिंताजनक है। इस मौके पर जगमोहन मेहंदीरत्ता, एसएस रजवाड़, विनय शर्मा, बीपी सुंदरियाल, राजन पुंडीर, आरके गैरोला, मुरारी लाल नौटियाल, अनिल जैन, एलएम बडोनी आदि शामिल रहे।