राजधानी में बुजुर्ग दिवस के अवसर पर एक आश्रम में बुजुर्गो को कपड़े दिए जा रहे थे।
जैसे ही बूढ़ी महिलाओं को साड़ी दी गई तो वह एक-दूसरे की साड़ी देखने लगी। इस दौरान महिलाएं एक-दूसरे से अपनी साड़ी की तुलना करने लगीं।
गुस्साई महिला
सब एक-दूसरे के बाते बना ही रहे थे कि एक महिला अपनी साड़ी लेकर आई और गुस्से में बोली पिछली बार भी ऐसी ही साड़ी दी थी। गुस्साई महिला बोली की ये लोग ढंग का कपड़ा नहीं दे सकते क्या। दान के नाम पर ये लोग हमेशा ही ऐसे कपड़े पकड़ा देते हैं।