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Fake Doctor Case: मामले में आया नया मोड़, अब चिकित्सा परिषद के पूर्व चेयरमैन की मार्कशीट को बताया फर्जी

Mon, 01 May 2023 02:51 PM IST
देहरादून ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

सामने आया कि भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड के अधिकारियों ने दो साल पहले 111 फर्जी डॉक्टरों के पंजीकरण पकड़े थे। लेकिन, इसकी शिकायत न तो पुलिस से की गई, न ही विभाग को सूचित किया गया।
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फर्जी डॉक्टर मामला - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
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देहरादून में फर्जी डॉक्टर प्रकरण में अब नया मोड़ आया है। अभी तक भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड में पंजीकृत डॉक्टरों के प्रमाणपत्र फर्जी बताए जा रहे थे। लेकिन, अब इस मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपी लिपिक विवेक रावत ने परिषद के एक पूर्व चेयरमैन की 12वीं की मार्कशीट को ही फर्जी बता दिया है। रविवार को विवेक रावत के अधिवक्ता डॉ. प्रशांत पाठक ने आरोप लगाया कि पूर्व चेयरमैन ने इसी मार्कशीट के आधार पर बीएएमएस की डिग्री ली और फिर परिषद के चेयरमैन बन गए। उन्होंने आरटीआई में इसका खुलासा होने का दावा किया है।

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रविवार को प्रेस क्लब में पत्रकारों से वार्ता में उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस बड़े अधिकारियों को बचाने के लिए छोटों पर कार्रवाई कर रही है। इस संबंध में आरोपी विवेक रावत ने कोर्ट में प्रार्थनापत्र दिया है, जिस पर सोमवार (आज) को सुनवाई होनी है। पाठक ने बताया कि 10 जनवरी 2023 को एसटीएफ ने दो फर्जी डॉक्टर और उन्हें डिग्री मुहैया कराने वाले एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। इस मामले में कुल 26 डॉक्टरों के नाम होने की बात कही गई थी। इसकी जांच तत्कालीन सीओ नेहरू कॉलोनी को सौंपी गई थी। जब डॉक्टरों के पंजीकरण भी फर्जी तरीके से होने की बात सामने आई तो जांच भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड तक पहुंच गई। इसके बाद पुलिस ने यहां के तीन लिपिक विवेक रावत, अंकुर माहेश्वरी और विमल प्रसाद को गिरफ्तार किया था।

जमानत पर छूटने के बाद दो दिन पहले विवेक रावत ने विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) में उपस्थित होकर परिषद के पूर्व अधिकारियों और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। विवेक ने कोर्ट को बताया कि परिषद के पूर्व और वर्तमान अधिकारियों ने मिलकर यह फर्जीवाड़ा किया है। बताया कि एक पूर्व चेयरमैन की 12वीं की मार्कशीट फर्जी है। विवेक का कहना है कि यह मार्कशीट उत्तर प्रदेश बोर्ड की है। जिस पर पास होने का वर्ष 1990 अंकित है। जब उन्होंने आरटीआई के जरिये उनकी मार्कशीट के संबंध में जानकारी मांगी तो उस स्कूल के प्रधानाध्यापक ने जवाब दिया कि इस मार्कशीट में अंकित क्रमांक का कोई छात्र उनके यहां पंजीकृत ही नहीं था। जबकि इसी मार्कशीट के आधार पर उन्होंने यूपी के धामपुर से बीएएमएस की डिग्री ली थी। इसके बाद वह चेयरमैन भी बन गए। यह पूर्व चेयरमैन देहरादून में एक क्लीनिक भी चलाते हैं।
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10 सालों से चल रहा फर्जीवाड़ा

आरोप है कि चिकित्सा परिषद की उत्तराखंड शाखा में यह फर्जीवाड़ा बीते 10 सालों से चल रहा है। इस दौरान हजारों फर्जी डॉक्टरों को पंजीकृत किया गया। इसके लिए उनसे आठ से 10 लाख रुपये तक लिए गए हैं। विवेक ने कोर्ट से बीते 10 वर्षों में यहां रहे सभी अधिकारियों-कर्मचारियों की जांच कराने की मांग की है।

पुलिस पर अवैध हिरासत में रखने का आरोप
आरोपी विवेक ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने उसे अवैध तरीके से हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया था। उसे दफ्तर से दो फरवरी 2023 को गिरफ्तार किया गया था। जबकि, जेल उसे छह फरवरी को भेजा गया।

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111 फर्जी डॉक्टर पकड़े फिर मामला रफा-दफा
भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड के अधिकारियों ने दो साल पहले 111 फर्जी डॉक्टरों के पंजीकरण पकड़े थे। लेकिन, इसकी शिकायत न तो पुलिस से की गई, न ही विभाग को सूचित किया गया। आरोप है कि लेनदेन कर इस मामले को रफा-दफा कर दिया गया। मामले में कोर्ट गए बाबू की तरफ से उसके अधिवक्ता ने यह आरोप लगाया है। इसके लिए उन्होंने दो साल पहले की जांच रिपोर्ट भी तलब कराने की मांग की है।

दरअसल, शुरुआत से ही भारतीय चिकित्सा परिषद के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध लग रही थी। पंजीकरण के वक्त डॉक्टरों के सभी दस्तावेज जांचे जाते हैं। संबंधित शिक्षण संस्थान से बाकायदा रिपोर्ट ली जाती है। ऐसे में एसटीएफ ने जिन डॉक्टरों के नाम बताए उनके पंजीकरण कैसे हो गए। जांच जब परिषद तक पहुंची तो तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। रजिस्ट्रार को भी नामजद कर लिया गया। लेकिन, अब एक आरोपी बाबू के अधिवक्ता डॉ. प्रशांत पाठक ने परिषद के अफसरों की कार्यप्रणाली को ही कठघरे में ला दिया है।

डॉ. प्रशांत पाठक का कहना है कि दो साल पहले अधिकारियों ने यहां पर 111 फर्जी डॉक्टरों के पंजीकरण पकड़े थे। कुछ अधिकारियों ने इसकी सूचना पुलिस को देने को भी कहा था, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे अनसुना करते हुए मामले को वहीं पर रफा-दफा कर दिया। आरोप है कि मामले में पैसों का बहुत बड़ा खेल हुआ था। अधिवक्ता डॉ. प्रशांत पाठक मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं।

पुलिस की सूची में 55 फर्जी डॉक्टर
फर्जी डॉक्टर मामले में शुरुआत में सिर्फ 26 चिकित्सकों के नाम बताए गए थे। लेकिन, जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी तो और भी नाम सामने आने लगे। पुलिस का दावा था कि इनमें से ज्यादातर फरार हैं। कुल 55 डॉक्टरों की सूची पुलिस ने बनाई है। इनमें से 14 डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया है। जबकि, डिग्री मुहैया कराने वाले इमलाख और उसके भाई को भी पुलिस दबोच चुकी है।
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