प्राचीन शिव मंदिर समिति सिमोग की ओर से अपने आराध्य बिजट देवता के लिए 10 किलो चांदी और पांच तोला सोने की धातु से पालकी की तैयार की गई है। नव निर्मित पालकी को आज (रविवार) को यमुना धाम हरिपुर और सोमवार को देसऊ गांव के समीप (देवपाणी) नायणी में शाही स्नान करवाया जाएगा। दोपहर बाद शुभ लग्नानुसार सिमोग गांव स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना कर पालकी को स्थापित किया जाएगा।
देवता के वजीर कुंवर शर्मा, पुजारी इंद्र शर्मा, दौलत शर्मा, भंडारी रमेश शर्मा नारायण आदि ने बताया कि सिमोग गांव स्थित प्राचीन मंदिर में शिलगुर, बिजट और चुडू देवता विराजमान हैं। तीनों ही देवता की चांदी की अलग-अगल पालकियां हैं। बताया कि हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के चुड़धार स्थित मंदिर के बाद सिमोग स्थित प्राचीन मंदिर की बड़ी मान्यता है। लोग यहां संतान प्राप्ति के लिए, बच्चों के मुंडन संस्कार और मनोकामना मांगने के लिए पहुंचते हैं।
बताया कि बिजट महाराज की पालकी बहुत ज्यादा पुरानी हो गई थी, इस कारण समिति ने देवता के लिए नई पालकी के निर्माण का निर्णय लिया गया। इसके लिए कालसी ब्लॉक के मुंधान निवासी कार सेवक रमेश चंद्र को बुलाया गया। बताया की पालकी तैयार हो गई है। परंपरानुसार पालकी के शुद्धिकरण के लिए पहले यमुना के पवित्र जल और देवता के अपने जल स्त्रोत (देवपाणी) में शाही स्नान करवाया जाता है। उसके बाद पालकी मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करती है। संवाद
25 मई को बॉलीवुड गायक जुबिन नौटियाल के घर जाएगी पालकी
- मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष सिमोग गांव निवासी कुंवर शर्मा, पूर्व प्रधान ज्ञान शर्मा, दिनेश शर्मा, पूरण शर्मा आदि ने बताया कि सच्ची श्रद्धा भक्ति से मांगी गईं मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु एक रात्रि के प्रवास पर देवता की तीनों पालकियों को अपने पैतृक आवास पर पूजा-अर्जना के लिए पैदल ले जाते हैं। बताया कि नवनिर्मित देवता की पालकी आगामी 25 मई को बॉलीवुड गायक जुबिन नौटियाल के पैतृक आवास क्यारी गांव जाएगी।
महज 22 दिनों में तैयार की देवता की पालकी
- उपवास रखा किया जाता है पालकी निर्माण
संवाद न्यूज एजेंसी
चकराता। कालसी ब्लॉक के मुंधान गांव निवासी कार सेवक रमेश चंद्र ने बताया कि देव चिह्न बनाना उनका पुश्तैनी कार्य है। बताया कि देवता की पालकी को उन्होंने सिर्फ 22 दिन में तैयार किया है। जबकि, आमतौर पर पालकी के निर्माण में ढाई से तीन माह का समय लग जाता है। रमेश चंद्र ने बताया कि ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि कर देव चिह्वों का निर्माण कार्य किया जाता है। बताया कि धार्मिक मान्यता अनुसार निर्माण कार्य के समय भोजन करना वर्जित होता है। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन सुबह सात बजे निर्माण कार्य शुरू करते थे। रात को करीब नौ बजे तक लगातार निर्माण कार्य जारी रहता था। बताया कि कारीगर देव चिह्न बनाते समय पूरे दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं। उन्होंने बताया भोजन करने के बाद किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है।