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Amar Ujala Samvad: पूर्व सैनिकों ने उठाया मुद्दा, बोले- वीरांगनाओं को परिवार चलाने के लिए मिले पूरी पेंशन

Sun, 25 Jun 2023 02:12 PM IST
रेनू सकलानी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

पूर्व सैनिकों का कहना है कि बाॅर्डर पर कठिनाई और जोखिम सबसे ज्यादा जवान उठाते हैं। इसके बाद भी जोखिम के सापेक्ष उन्हें एमएसपी नहीं मिल रही। युद्ध में अधिकारी और जवान दोनों अपने शरीर के अंगों को गंवाकर दिव्यांग हो जाते हैं लेकिन डिसेबल भत्ता एक समान नहीं मिलता। यह दर्द पूर्व सैनिकों ने पटेलनगर स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम में बयां किया। 
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संवाद में पहुंचे पूर्व सैनिक - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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अमर उजाला कार्यालय में शनिवार को संवाद कार्यक्रम का आयजिन किया गया। जिसमें सेना के जवानों ने पहुंचकर अपनी पीड़ा बताई। करीब 40 मिनट तक इस चले इस कार्यक्रम में कठिनाई और जोखिम सबसे ज्यादा जवाने उठाते हैं तो अधिकारियों को एमएसपी क्यों ज्यादा दी जा रही।

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अधिकारी और जवान के अंग का उपयोग एक समान तो डिसेबल भत्ता एक समान क्यों नहीं, वीरांगनाओं को परिवार चलाने लायक पर्याप्त पेंशन क्यों नहीं, वीआरएस वाले 2014 जून तक को ओआरओपी का लाभ दिया जाना जून 2014 के बाद वाले को छोड़ क्यों दिया। कहा कि रिजर्विस्ट सैनिकों का योगदान एक समान फिर भी इन्हें ओआरओपी का लाभ क्यों नहीं, ग्रुप एक्स के पूर्व सैनिकों के पेंशन में कटौती क्या छलावा नहीं है।

सीएसडी में सामान की कीमत सिपाही व आफिसर के लिए सामान तो भेदभाव क्यो, सिपाही और आफिसर को बीमार में दर्द एक सा तो ईसीएचएस द्वारा इलाज में भेदभाव जैसे विभिन्न मुद्दों पर सैनिकों ने खुलकर अपने विचार रखें।

 

समान रैंक समान पेंशन की विसंगतियों का होना चाहिए निवारण

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अलम सिंह भड़ोनी ने कहा कि वर्ष 1973 तक जेसीओ और जवानों को बलपूर्वक कम सेवा अवधि व उम्र में रिटायर करने की बाध्यता के कारण उन की पेंशन का निर्धारण वेतन का 75 प्रतिशत हुआ करता था, जिसे घटाकर 50 प्रतिशत करते हुए आश्वासन दिया कि समान रैंक समान पेंशन (ओआरओपी) के माध्यम से इसकी क्षतिपूर्ति सरकार द्वारा की जाएगी। ओआरओपी जुलाई 2014 से स्वीकृत की, पर इसका सही निर्धारण नहीं होने से जेसीओ, जवानों को नाम मात्र का लाभ मिला और सरकार द्वारा स्वीकृत बजट का बड़ा हिस्सा सेना के तीन प्रतिशत रिटायर्ड अधिकारियों की जेब में चला गया, जो इसके हकदार ही नहीं थे।

मिलट्री सर्विस पे से उपजा भेदभाव और अन्याय
भगत सिंह राणा ने कहा कि मिलट्री सर्विस पे सैन्य सेवा की कठिनाईयों और जोखिम के आधार पर स्वीकृत की गई है। इसके निर्धारण में कठिनाईयों और जोखिम के आधार पर बल्ककुल अनदेखा करते हुए तीन प्रतिशत अधिकारियों को 15500 रुपये प्रतिमाह और जिन 97 प्रतिशत जेसीओ व जवानों को सबसे अधिक कठिनाई और जोखिम है, उन्हें 5200 रुपये मिलट्री सर्विस पे का निर्धारण कर बहुत बड़ा अन्याय किया है। इसका सीधा प्रभाव पेंशन निर्धारण पर होने से अधिसंख्या पूर्व सैनिकों का शोषण हुआ है। सेना कि कठिनाईयों और जोखिम की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों के अलावा दल से सर्वे कराया जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
 
डिसेबिलिटी पेंशन में भेदभाव और विसंगतिवीरेंद्र सिंह बिष्ट ने कहा कि यह बात बिल्कुल सही है कि हर व्यक्ति को अपने शरीर का अंग जरुरी और प्यारा होता है तो फिर अधिकारी और गैर अधिकारी की डिसेबिलिटी पेंशन में अंतर क्यों हैं। इसी प्रकार वार इंजरी डिसेबिलिटी और वार इंजरी इनवेलिड पेंशन में भी अप्रत्याशित भेदभाव कर दिया गया है। सातवें वेतन आयोग ने तो जवान, जेसीओ और अधिकारियों के लिए 12000, 17000 और 27000 की सिफारिश की थी, लेकिन अधिकारियों ने माटा माल मारने के लिए अनामली कमेटी के मार्फत अपने हित में बदलाव करवा लिया और यही कारण है कि सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 40 प्रतिशत से अधिक अधिकारी डिसेबिलिटी पेंशन के साथ रिटायर होने का जुगाड़ बैठाकर मोटी राशी हड़प रहे हैं।

रिजर्विस्ट पेंशनर्स को ओआरओपी नहीं देना गंभीर
इंद्र सिंह शाही ने कहा कि एक नियमित सैनिक के बजाय एक रिजर्विस्ट देश के प्रति ज्यादा समर्पित रहा है। सेना द्वारा रिजर्व फोर्स रखने और सरकार का पैसा बचाने के लिए जबरन सैनिकों को रिर्जर्विस्ट के तौर पर घर भेजा गया। साथ ही शर्त रखी गई कि प्रतिवर्ष एक माह की ट्रेनिंग के लिए और युद्ध की स्थिति में मोर्चे पर उपस्थित होना अनिवार्य होगा। ना तो वह स्थाई नौकरी के लिए स्वतंत्र रहा और ना ही कोई अपना व्यवसाय स्थापित करने की स्थिति में रहा। जब भी सेना और देश ने युद्ध के लिए बुलाया तो सब कुछ जीवन यापन के साधन छोड़कर मोर्चे पर पहुंचा।
 
ग्रुप एक्स के सैनिकों की पेंशन में भी विसंगति
वीर सिंह पंवार ने कहा कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद वर्ष 2016 से पूर्व के एक्स ग्रुप की पेंशन पाने वाले पूर्व सैनिकों की पेंशन कम हो गई। जो बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है। इसमें सुधार होना भी आवश्यक है।
 
बिना आर्थिक लाभ के मानद पद देने का क्या औचित्यडीएस क्षेत्री ने कहा कि गैर अधिरारी वर्ग के कुछ पदों के सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद मानद पद दिए जाते हैं, पर उन्हें किसी भी प्रकार का मौद्रिक लाभ नहीं दिया जाता। सभी मानद पद धारी सैनिकों को मौद्रिक लाभ स्वीकृत होने चाहिए।

प्री-मेच्योर रिटायर होने वाले सैनिकों को ओआरओपी
एसबी थापा ने कहा कि कोई भी सैनिक अपने टमर्स आफ एगेजमेंट के बाद रिटायर होता है तो पेंशन का अधिकारी हो पाता है। फिर भी ओआरओपी की धारणा को नकार कर उसे वंचित रखना अन्यायपूर्ण निर्णय है।
 
सातवें वेतन आयोग द्वारा वेतन का आधार नए पे मेट्रिक्स लेवल करने से नुकसान
अशोक सुंदरीयाल ने कहा कि सातवें वेतन आयोग द्वारा पे मेट्रिक्स लेवल में वेतन निर्धारण करते समय बड़ी चूक की गई। जिस कारण एक जनवरी 2016 के बाद रिटायर होने वाले पूर्व सैनिकों को पुरानों से कम पेंशन मिल रही है। जिससे ओआरओपी की अवधारणा का पूर्ण तरीके से उल्लंघन हुआ है और पहली बार ऐसा देखने को मिला। इसलिए ओआरओपी द्वितीय में भी कुछ रेक्स को तो एक नया पैसा भी नहीं मिल रहा है, बल्कि पेंशन कम हो गई।
 
पारिवारिक पेंशन के निर्धारण में वृद्धि
धीरज थापा ने कहा कि पेंशनर की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पर परिवार के पालन पोषण का अधिक भार बढ़ जाता है। पेंशनर यदि जीवत होता है तो वह पेंशन के अलावा आय वृद्धि के कुछ उपाय करता रहता है। पेंशनर की मृत्यु के बाद यह समाप्त हो जाता है। ऐसे में पारिवारिक पेंशन कम से कम 60 प्रतिशत के स्थान पर अधिक होनी चाहिए।
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आनरेरी लेफि्टनेंट और कप्तान की पेंशन वृद्धि में अनदेखी
अशोक लींबू ने कहा कि पहले आनरेरी लेफि्टनेंट और आनरेरी कैप्टन कमीशंड लेफि्टनेंट और कप्तान से अधिक पेंशन लिया करता था। अब उन रेक्स की पेंशन वृद्धि नहीं के बराबर की जा रही है। शायद इस मामले में भी दुर्भाग्यवश ऐसा किया गया है। क्योंकि अब टाइम स्केल प्रमोशन के कारण कोई कमीशंड आफिसर लेफि्टनेंट कैप्टन और मैजर रैंक से रिटायर ही नहीं होता।

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जोखिम भरे अभियान और सेवा के लिए सभी के सामान भत्ते का हो भुगतान
लक्ष्मी प्रसाद ने कहा कि हाई एलटीटयूट अलाउंस नेवी में डाइविंग आवर्स पैरा जंपिंग अलाउंस का निर्धारण अधिकारी और गैर अधिकारी सैनिक के वेतन के आधार पर नहीं हो कर समाप्त होना चाहिए। क्योंकि यह सभी जोखिम भरे अभियानों के लिए होते हैं और जोखिम सभी के लिए समान रूप से होता है।
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