महिला का लेखन सिर्फ डायरी तक सीमित नहीं
महिलाओं ने कहा कि पहाड़ की महिलाओं की हालत अब भी बेहतर नहीं है। आज भी वह किसी कार्य में रुचि लेती हैं तो उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया जाता है। कुछ महिलाओं ने यह भी बताया कि उनके ससुराल में लेखन कार्य बंद करवा दिया गया था जबकि वह बड़े समाचार पत्रों के लिए लिखती थीं। वहीं, आज भी कुछ पुरुष लेखक हैं जो महिलाओं को सिर्फ सौंदर्य की चीज समझकर लेखन कार्य कर रहे हैं। लेकिन आज महिला की लेखन कला सिर्फ डायरी तक ही सीमित नहीं है वह अपनी बात को सोशल मीडिया पर भी प्रमुखता से रख रही हैं। वर्तमान स्थितियों पर महिलाओं की कलम समाज में बदलाव ला सकती है।
महिलाओं को समझना होगा कि वह क्या करना चाहती हैं। अपनी बात को समाज में लाने के लिए लेखन का सहारा लेना होगा जिससे वह अपने जीवन के अनुभव को बता सकें।
झरना माथुर
महिलाओं के रास्ते में उनके अपने अलावा और कोई नहीं खड़ा है। हमें यह बात समझने की जरूरत है।
सीमा शफक
जब तक महिलाएं तमाम कुरीतियों को नहीं तोड़ेंगीं तब तक बदलाव नहीं आएगा। खुद में बदलाव करने की जरूरत है। लोग कहते हैं कि तुम क्या लाए थे जो साथ ले जाओगे। मैं कहती हूं कि जीवन की खाली किताब लाए थे उसमें अपने कर्मों का हिसाब ले जाएंगे।
सिमरन दिवाकर
महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। शिक्षा ही इसका सबसे सशक्त माध्यम है। एक शिक्षित महिला समाज को शिक्षित कर सकती है।
डॉ. सीमा गुप्ता
ये भी रहीं मौजूद
प्रिया देवली, सुप्रिया सकलानी, सीमा थापा, मीना जोशी, शांति बिंजोला, पल्लवी रस्तोगी, कमलेश्वरी मिश्रा, विनीता मैठाणी, पूजा ध्यानी अमोली, रक्षा बौड़ाई, प्रो. ऊषा, महेश्वरी कनेरी