जमीन की रंजिश को लेकर छह साल पहले इंटर कालेज के एक प्रवक्ता की उसकी पत्नी व नातिन के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में एससीएसटी कोर्ट जज दिवाकर प्रसाद चतुर्वेदी ने दो सगे भाइयों समेत चार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दोषियों से 20-20 हजार रुपये का आर्थिक दंड भी वसूलने के आदेश दिया है।
शासकीय अधिवक्ता अरुण कुमार यादव व रमेश पांडेय ने बताया मिथिला देवी निवासी महोई थाना सौरिख ने 23 सिंतबर 2012 को सौरिख थाने में रिपोर्ट लिखाई थी। जिसमें वादी के मुताबिक उसके पति श्याम बाबू मिश्रा अकबरपुर में एक इंटर कालेज में प्रवक्ता के पद पर थे। 23 सितंबर को वह अपने पति व नातिन शालिनी के साथ खेतों की ओर जा रहे थे। उसी समय सड़क किनारे झाड़ियों में पहले से घात लगाकर बैठे गांव के ही देवेंद्र, मनीराम पुत्र हरीराम, विनीत मिश्रा पुत्र मनीराम और अंजीत पुत्र रामपूजन ने उसके पति को पकड़ लिया।
उक्त लोग मारपीट करने लगे उसी समय मनीराम ने गोली मारने के लिए ललकारा और विनीत मिश्रा ने कनपटी में तमंचा सटाकर गोली मार दी। उक्त चारों मौके से भाग गए। श्याम बाबू मिश्रा की मौके पर ही मौत हो गई। शासकीय अधिवक्ताओं ने बताया कि विनीत मिश्रा फरार हो गया था, जबकि पुलिस ने अन्य तीन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। विनीत मिश्रा को एसओजी टीम ने आगरा से गिरफ्तार किया था। मामले की विवेचना सीबीसीआईडी को भी सौंपी गई थी। विवेचक ने कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान चाराें आरोपी हत्या के दोषी पाए गए। कोर्ट ने चारों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
हत्या में आजीवन कारावास
कन्नौज। तीन सगे भाइयों ने मिलकर 1995 में एक वृद्ध की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई, जबकि एक आरोपी को 1999 में कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई। वहीं एक आरोपी घटना के बाद फरार हो गया था। जिसे 2002 में गिरफ्तार किया गया। मामले से जुड़े दस्तावेज हाईकोर्ट पहुंच गए थे। उन्हें सुनवाई के लिए पांच मार्च को मंगाया गया। नौ मार्च 2018 से मामले में लगातार सुनवाई हुई और 31 मार्च को फास्ट ट्रैक कोर्ट जज अजय कुमार श्रीवास्तव ने तीसरे आरोपी को भी हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
शासकीय अधिवक्ता नवीन कुमार दुबे व छेदीलाल गौतम ने बताया कि मुन्नी देवी पत्नी स्व. धलक सिंह निवासी मिर्जापुर थाना सौरिख ने छह नवंबर को थाने में रिपोर्ट लिखाई थी। जिसमें बताया कि पांच नवंबर 1995 की रात वह अपने पुत्र अनिल व पुत्री गुड्डी के साथ घर के आंगन में सो रही थी। रात करीब 11:30 बजे जिंदापुर निवासी अरविंद यादव, राजेंद्र सिंह यादव व गोपाल यादव पुत्र भीखम सिंह यादव असलहा व लाठी डंडो से लैस होकर उसके दरवाजे पर आ पहुंचे। काफी देर तक गेट खटखटाते रहे। इस पर उसके देवर मगनलाल ने दरवाजा खटखटाने से मना किया।
इस पर उक्त लोग गेट तोड़कर अंदर घुस आए और मगन लाल को लाठी-डंडे से पीटने लगे। इसके बाद राजेंद्र यादव ने उसे गोली मार दी। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। हत्या के बाद अरविंद यादव फरार हो गया। सुनवाई के दौरान गोपाल यादव की मौत हो गई और 1999 में कोर्ट ने राजेंद्र यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 2002 में पुलिस ने तीसरे आरोपी अरविंद यादव को गिरफ्तार किया। अरविंद यादव पर केस चलाने के लिए इसी माह की पांच तारीख को उसकी फाइल हाईकोर्ट से मंगाई गई। नौ मार्च से मामले में लगातार सुनवाई की गई और फास्ट ट्रैक कोर्ट अपर जिला जज अजय कुमार श्रीवास्तव ने दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने पांच हजार रुपये का जुर्माना वसूल करने के भी निर्देश दिए।
1999 में हाईकोर्ट चले गए थे दस्तावेज
शासकीय अधिवक्ता नवीन कुमार दुबे ने बताया कि 1999 में कोर्ट ने जब राजेंद्र सिंह यादव को सजा सुनाई तो उसने हाईकोर्ट में अपील की। इस अपील में केस से संबंधित सभी दस्तावेज हाईकोर्ट चले गए। इसलिए सुनवाई में देरी हुई। पांच मार्च को हाईकोर्ट से दस्तावेज मांगे गए और दस्तावेज मिलते ही नौ मार्च से सुनवाई शुरू हो गई। शनिवार को कोर्ट ने सबूताें और गवाहों के आधार पर आरोपी को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।