टैक्स अदायगी की छानबीन की गई तो पता चला कि कंपनी तय मानकों के अनुसार टैक्स नहीं दे रही थी। कंपनी ने अपना कारोबार एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने के लिए इस्तेमाल होने वाले एफ फार्म दिए थे।
जांच पड़ताल में यह फार्म भी फर्जी पाए गए। आबकारी एवं कराधान विभाग ने बाकायदा दिल्ली में इसकी जांच पड़ताल की। इसके बाद ही यह मामला पकड़ में आया। वर्ष 2014 में कारखाना को सील कर आबकारी एवं कराधान विभाग ने सील कर दिया और रिकवरी के लिए नोटिस जारी किया।
लेकिन, कंपनी प्रबंधन ने अदालत की शरण ले ली। अदालत ने याचिका खारिज कर दी। कंपनी उच्च न्यायालय में भी गई। लेकिन, वहां भी कोई राहत नहीं मिली। इतनी लंबी प्रक्रिया के बाद अब कहीं जाकर आबकारी एवं कराधान विभाग ने पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई है।
कंपनी का चेयरमैन भूमिगत बताया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि कंपनी का चेयरमैन विदेश चला गया है। आबकारी विभाग के पास भी ऐसी ही सूचना है।
आबकारी एवं कराधान विभाग ने वर्ष 2009 से लेकर मार्च 2014 तक 2175.51 करोड़ की टैक्स रिकवरी का मामला बनाया है।
अब सवाल यह उठता है कि लगभग तीन वर्षों में यह राशि वसूल करने को सरकार ने कदम क्यों नहीं उठाए। आबकारी एवं कराधान विभाग का 21.75 करोड़, बिजली बोर्ड का 4.31 करोड़ वसूला जाना बाकी है।
जबकि लगभग 16 बैंकों से लिए गए करीब 2300 करोड़ रुपये की देनदारियां भी शेष हैं। आयकर विभाग की भी 780 करोड़ की रिकवरी बताई जा रही है। आबकारी एवं कराधान विभाग के सहायक आयुक्त जीडी शर्मा के अनुसार विभाग ने मामले की एफआईआर दर्ज करवाई है। सूचना है कि चेयरमैन देश से बाहर गए हैं।