ध्यानचंद ने सेना की तरफ से पहली बार न्यूजीलैंड का दौरा किया। यह उनका पहला विदेशी दौरा था। इसके बाद 23 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार 1928 के एम्सटडर्म ओलंपिक में भाग लिया। इस दिन का वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में बहुत ही गौरवमयी शब्दों में किया है। उन्होंने लिखा, 'आज हमारे सपने की भोर हुई है। उसका सूरजा निकल आया है। हम काफी निश्चित हैं दुनिया को यह बताने के लिए कि हॉकी में हम सर्वश्रेष्ठ हैं'।
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ध्यानचंद की कला कौशल का शब्दों से बयां करने से लोगों में हॉकी की समझ आ जाती। यह ध्यानचंद की हॉकी प्रतिभा की वजह से ही संभव है।
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जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ। तब क्रिकेट में सर डान ब्रैडमैन और सर लेन हटन का बल्ला खामोश रहा। इसी तरह ध्यानचंद ने भी उस दौर में हॉकी नहीं खेला। अगर खेले होते तो उनके करियर में दो और स्वर्ण पदक जुड़ जाते।
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विभाजन के दौरान ध्यानचंद की नियुक्ति फिरोजपुर में थी। पाकिस्तान में उनकी 15000 रुपए की जमा पूंजी खो गई थी। इसके बाद वह झांसी लौट आए थे। 1947 का ईस्ट अफ्रीका का दौरा उनका आखिरी दौरा था। वह अंतिम दिनों में पटियाला में एनआईएस के चीफ कोच भी रहे।
जीवन के आखिरी दिनों में उनका जीवन तंगहाली में गुजरा। दिल्ली के हॉस्पिटल में वह भर्ती रहे लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया।
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