फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ध्यानचंद ने जब कहा,आज हमारे सपनों की भोर हुई   

Thu, 12 Oct 2017 02:07 PM IST
amarujala.com-presented by: शरद मिश्र
विज्ञापन
ध्यानचंद - फोटो : hindustan times
विज्ञापन
ध्यानचंद ने सेना की तरफ से पहली बार न्यूजीलैंड का दौरा किया। यह उनका पहला विदेशी दौरा था। इसके बाद 23 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार 1928 के एम्सटडर्म ओलंपिक में भाग लिया। इस दिन का वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में बहुत ही गौरवमयी शब्दों में किया है। उन्होंने लिखा, 'आज हमारे सपने की भोर हुई है। उसका सूरजा निकल आया है। हम काफी निश्चित हैं दुनिया को यह बताने के लिए कि हॉकी में हम सर्वश्रेष्‍ठ हैं'।  
विज्ञापन


पढ़ेंः- जानिए, सचिन तेंदुलकर कैसे हो गए भारत रत्न के लिए ध्यानचंद से आगे  

ध्यानचंद की कला कौशल का शब्दों से बयां करने से लोगों में हॉकी की समझ आ जाती। यह ध्यानचंद की हॉकी प्रतिभा की वजह से ही संभव है।  
 
पढ़ेंः-  चोटिल ध्यानचंद जब साथियों से बोले, बदले की भावना के सा‌थ मत खेलो

जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ। तब क्रिकेट में सर डान ब्रैडमैन और सर लेन हटन का बल्ला खामोश रहा। इसी तरह ध्यानचंद ने भी उस दौर में हॉकी नहीं खेला। अगर खेले होते तो उनके करियर में दो और स्वर्ण पदक जुड़ जाते।  

पढ़ेंः- जब हिटलर की नजर 'दद्दा' के अंगूठे के पास फटे जूतों पर टिक गई...

विभाजन के दौरान ध्यानचंद की नियुक्ति फिरोजपुर में थी। पाकिस्तान में उनकी 15000 रुपए की जमा पूंजी खो गई थी। इसके बाद वह झांसी लौट आए थे। 1947 का ईस्ट अफ्रीका का दौरा उनका आखिरी दौरा था। वह अंतिम दिनों में पटियाला में एनआईएस के चीफ कोच भी रहे। 
विज्ञापन
विज्ञापन


जीवन के आखिरी दिनों में उनका जीवन तंगहाली में गुजरा। दिल्ली के हॉस्पिटल में वह भर्ती रहे लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया। 

ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने के लिए हस्ताक्षर करें यहां- goo.gl/hYuwMF
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें