मैच मोहाली के पीसीए स्टेडियम में खेला गया था। ऑस्ट्रेलिया ने पहले खेलते हुए 428 रन बनाए। भारत पहली पारी का जवाब देते हुए 405 रन ही बना पाया। दूसरी पारी में कंगारू टीम 192 रन पर सिमट गई। भारत के सामने 216 रनों का लक्ष्य आया। मैच भारत के पक्ष में लग रहा था। मगर देखने में आसान लगने वाला यह लक्ष्य आगे चलकर मुश्किल बन गया।
वीरेंद्र सहवाग, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, सुरेश रैना जैसे सारे धुरंधर एक के बाद एख पवेलियन की राह पकड़ चुके थे। सितारों से सजी टीम इंडिया ने अपने आठ विकेट महज 124 रन पर खो दिए थे। हार सामने दिख रही थी और ऑस्ट्रेलिया की टीम काफी मजबूत नजर आने लगी।
क्रीज पर अभी वीवीएस लक्ष्मण मौजूद थे। सहनीय पीठ दर्द के बावजूद लक्ष्मण डटे रहे। मैदान नहीं छोड़ा, लेकिन जीत अभी भी मुश्किल थी क्योंकि उनका साथ देने के लिए कोई विशेषज्ञ बल्लेबाज सामने नहीं था। इस मैच की हार को जीत में लक्ष्मण ने जिस अंदाज में बदला, वह किस्सा बड़ा दिलचस्प था। इस जीत का श्रेय अकेले लक्ष्मण को दिया जाना भी तेज गेंदबाज ईशांत शर्मा और स्पिनर प्रज्ञान ओझा की मेहनत के साथ बेईमानी होगी।
वीवीएल लक्ष्मण और प्रज्ञान ओझा
- फोटो : ट्विटर
जब जीत कंगारू टीम की झोली में दिख रही थी, लक्ष्मण ने बेहद सधी और समझदारी पारी खेली और उनका साथ दिया ईशांत ने। लंबू के नाम से मशहूर इस तेज गेंदबाज ने मैच में 92 गेंदों का सामना करते हुए 31 रन बनाए। मिचेल जॉनसन, हिल्फेनहॉस, बॉलिंजर जैसे पेसर्स ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन ईशांत जैसे कसम खाकर आए थे कि अपनी विकेट नहीं देंगे।
शुरुआत में लक्ष्मण, ईशांत को स्ट्राइक देने से झिझक रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने विश्वास दिखाना शुरू किया। ईशांत ने स्ट्राइक रोटेट करनी शुरू की और बीच-बीच में चौक्के भी लगाए। दोनों ने मिलकर बेहद अहम 81 रन जोड़े।
जब लग रहा था कि दोनों टीम इंडिया को जीत तक ले जाएंगे, तभी हिल्फ़नहॉस ने ईशांत को पगबाधा आउट कर मैच में एक बार फिर दिलचस्पी पैदा कर दी। अब लक्ष्मण के साथ थे 11वें नंबर पर बल्लेबाजी कर रहे प्रज्ञान ओझा।
वीवीएल लक्ष्मण और प्रज्ञान ओझा
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स्कोर था 210 रन। आखिरी विकेट। इंडिया की आस थी वीवीएस लक्ष्मण। लक्ष्मण पहले से और ज्यादा संभलकर खेलने लगे। जीत अब भी 11 रन दूर थी और हर गेंद सांस थाम रही थी। लक्ष्मण को पीठ में भयानक दर्द था, जिसकी वजह से उन्हें रनर मिला हुआ था। ये वो जमाना था जब बैट्समैन रनर ले सकते थे। रनर के रूप में आए हुए थे सुरेश रैना।
लक्ष्मण स्ट्राइक पर। बॉलिंग पर बेन हिल्फेनहॉज। रैना स्क्वैयर लेग पर क्रीज के अन्दर खड़े हुए थे। रन लेने को तैयार। लक्ष्मण ने बॉलर के हाथ के नीचे से गेंद निकालकर एक रन चुराना चाहा। वहां फील्डर मौजूद था, बावजूद इसके एक रन की पूरी संभावना थी।
इधर रनिंग एंड पर खड़ा बैट्समैन लक्ष्मण को ही देखे जा रहा था. सब कुछ इतना हड़बड़ी में हो रहा था कि उसे ये याद ही नहीं था कि मैदान पर 15 नहीं 16 लोग थे। रैना सोलहवें थे। नॉन-स्ट्राइकर ने लक्ष्मण को देखा. लक्ष्मण को चूंकि दौड़ना नहीं था, वो शॉट मारकर रुक गए।
नॉन-स्ट्राइकर ने लक्ष्मण को रुकते देखा, वो वापस लौट आया। उधर रैना दौड़कर आधी पिच पर आ पहुंचे थे। लक्ष्मण खीज गए। गुस्से में तमतमाए लक्ष्मण ने बल्ला उटाकर मारने का इशारा किया। जमकर बौखलाए और उनके मुंह से कुछ गालियां भी निकली।
वीवीएस लक्ष्मण और प्रज्ञान ओझा
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जीत तक पहुंचाने वाले रनों से दो रन से पहले जॉनसन की एक गेंद ओझा के पैड से टकराई तो ऐसा लगा कि लक्ष्मण और ईशांत की सारी मेहनत बेकार चली जाएगी। जब कंगारू टीम अपील कर रही थी, तो ओझा अपनी क्रीज से बाहर निकले और रन आउट होते-होते बचे।
ऑस्ट्रेलियाई फील्डर ने गेंद स्टंप की तरफ फेंकी, लेकिन ओझा बाल-बाल बचे और ओवरथ्रो के चार रन भी मिले। अगर गेंद स्टंप पर लगती तो ओझा पवेलियन जाते और भारत यह मैच हार चुका होता। इस एकस्ट्रा के चार रन के साथ ही भारतीय टीम यह मैच जीत गई। पूरी टीम पवेलियन से दौड़े मैदान में पहुंच गई।
कुछ देर पहले ओझा पर चिल्ला रहे लक्ष्मण ने उन्हें गले से लगा लिया और एक ऐतिहासिक जीत दर्ज हुई। बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी उसकी झोली से सरकते-सरकते रह गई।