रणजी को उनकी निराली बल्लेबाजी के लिए जाना जाता था। रणजीत सिंह ने अपनी कलाईयों की जादूगरी से इस खेल में लेग ग्लांस जैसे ऑन साइड के कई नए स्ट्रोक जोड़े थे। रणजी अपने जमाने के ऐसे बल्लेबाज थे जिनके पास कई तरह के स्ट्रोक की भरमार थी। इसका जिक्र रणजी के दोस्त सीबी फ्राई ने भी किया था।
फ्राई ने कहा था कि यदि कोई बल्लेबाज ऑन साइड पर ऐसे क्षेत्र में गेंद हिट करता था जहां के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं हो तो वह गेंदबाज से माफी मांगता था। विरोधी टीम का कप्तान कभी उस क्षेत्र में क्षेत्ररक्षक नहीं लगाता था। वह अपेक्षा करता था आप भद्रजन की तरह ऑफ साइड पर ही स्ट्रोक खेलेंगे। रणजी ने हालांकि इस धारणा को बदलकर रख दिया था और अपनी कलाईयों के इस्तेमाल से ऑन साइड पर काफी रन बटोरे थे।
विदेशी क्रिकेट क्लब में पहले भारतीय कप्तान रणजीत सिंह
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रणजी के इसी कौशल के कारण इंग्लैंड के चयनकर्ताओं को उन्हें अपनी टीम में शामिल करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह इंग्लैंड की टीम में शामिल होने वाले एशियाई मूल के पहले क्रिकेटर थे। उस वक्त भारत में अंग्रेजों का शासन था और रणजीत का इंग्लैंड टीम में चयन हुआ था।
रणजीत के इंग्लैंड टीम में चयन को लेकर काफी विवाद भी हुआ था। रणजीत का जब 1896 में इंग्लैंड टीम में चयन हुआ तब लार्ड हारिस इस चयन के खिलाफ थे। उनका कहना था कि रणजीत का जन्म इंग्लैंड में नहीं बल्कि भारत में हुआ है, तो इंग्लैंड टीम में उनका चयन नहीं होनी चाहिए।
हालांकि बाद में खुद पर लगे दांव को रणजीत सिंह ने सही साबित किया और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जुलाई 1896 में मैनचेस्टर में खेले गए अपने पहले टेस्ट मैच में ही 62 और नाबाद 154 रन की दो लाजवाब पारियां खेल डालीं।
रणजीत तेज खेलते हुए 23 चौके की मदद से 154 पर नॉट आउट थे और दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए जिन्हें अपने पहले टेस्ट मैच में पहली पारी में अर्धशतक और दूसरे पारी में शतक मारने का गौरव हासिल हुआ। सिर्फ इतना ही नहीं रणजीत टेस्ट क्रिकेट के पहले खिलाड़ी थे, जो अपने करियर के पहले टेस्ट मैच में शतक ठोकते हुए नॉट आउट रहे।
1897 में जब इंग्लिश टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई तो रणजी ने सिडनी में पहले टेस्ट मैच में 7वें नंबर पर बल्लेबाजी के लिए उतरकर 175 रन की बेहतरीन पारी खेली थी जिससे इंग्लैंड जीत दर्ज करने में सफल रहा था। रणजी इस मैच से पहले बीमार थे और वह कमजोरी महसूस कर रहे थे लेकिन इंग्लैंड की टीम उन्हें बाहर नहीं रखना चाहती थी।
विजडन ने उनकी इस पारी के बारे में लिखा था कि उनकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए यह बल्लेबाजी का बेहतरीन नमूना था क्योंकि वह पहले दिन 39 रन बनाने के बाद बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहे थे। दूसरे दिन सुबह का खेल शुरू होने से पहले तक डॉक्टर उनका इलाज कर रहा था।
रणजी इसके बाद टेस्ट मैचों में कभी शतक नहीं लगा पाए, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के इस दौरे में वे इंग्लैंड के सबसे सफल बल्लेबाजों में शामिल थे। उन्होंने तब 60.89 की औसत से 1157 रन बनाए थे। यही नहीं 1895 से लेकर लगातार दस सत्र तक रणजी ने 1000 से अधिक रन बनाए। इनमें 1899 और 1900 के सत्र में तो उन्होंने 3000 से अधिक रन ठोक दिए थे।
रणजी ने अपने करियर में 15 टेस्ट मैच की 26 पारियों में 44.95 की औसत से 989 रन बनाए। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 307 मैच खेले जिनमें 56.37 की औसत से 24,092 रन बनाए। इसमें 72 शतक और 109 अर्धशतक भी शामिल हैं। इस महान क्रिकेटर का 60 वर्ष की उम्र में 2 अप्रैल 1933 को जामनगर में निधन हुआ। उनके भतीजे दिलीप सिंह भी इंग्लैंड की तरफ से टेस्ट मैच खेले थे।
रणजीत ने अपने क्रिकेट करियर का पहला और आखिर मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ और मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रेफ्फोर्ड मैदान पर खेला। आखिरी मैच में रणजीत कुछ खास नहीं कर पाए थे। इस मैच में रणजीत कुल मिलाकर सिर्फ छह रन बना पाए थे। 1904 में रणजीत भारत वापस आ गए। रणजीत का क्रिकेट के प्रति इतना प्यार था कि 48 साल के उम्र में वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलना चाहते थे।
1907 में रणजीत नवानगर के महाराजा बने। एक अच्छे क्रिकेटर के तरह वह एक अच्छे एडमिनिस्ट्रेटर भी थे। 1934 में रणजीत के नाम पर भारत ने रणजी ट्रॉफी शुरू हुई। रणजीत भारत के पहले क्रिकेट खिलाड़ी थे, जिन्हें अंतराष्ट्रीय मैचों में मौका मिला था। रणजीत को भारतीय क्रिकेट का जन्म दाता माना जाता है।