भारत में जिसे क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। जब वो मैदान पर अपना बल्ला लिए उतरता है तो अरबों लोगों की दुआएं उसके साथ होती हैं। उसके नाम कई रिकॉर्ड हैं।
वनडे हो या टेस्ट, उसने क्रिकेट को एक नई ऊंचाई दी है। मैदान और मैदान के बाहर उसका व्यक्तित्व कई लोगों के लिए एक मिसाल है।
मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर किसी परिचय के मोहताज नहीं।
वर्ष 1989 में जब पाकिस्तान के दौरान के लिए सचिन तेंदुलकर को टीम में जगह मिली, तो किसी ने यह नहीं सोचा था कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट सचिन के बिना अधूरा रहेगा।
इन 22 वर्षों में सचिन तेंदुलकर ने मैदान पर प्रदर्शनों से मिसालें कायम की हैं।
सचिन तेंदुलकर का जन्म 24 अप्रैल 1973 को मुंबई में हुआ था। सचिन के पिता रमेश तेंदुलकर मराठी उपन्यासकार थे। अपने प्रिय संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के नाम पर उन्होंने अपने बेटे का नाम सचिन रखा था।
श्रेय
लेकिन क्रिकेट जगत में लाने का श्रेय उनके भाई अजित को जाता है। शारदाआश्रम विद्यामंदिर में पढाई के दौरान सचिन ने रमाकांत अचरेकर के अधीन क्रिकेट के गुर सीखे।
लोगों को ये जानकर आश्चर्य होगा कि पहले सचिन तेंदुलकर तेज गेंदबाज बनना चाहते थे। स्कूल के दौरान ही वे तेज गेंदबाजी के गुर सीखने के लिए एमआरएफ पेस फाउंडेशन गए।
लेकिन ऑस्ट्रेलिया के पूर्व तेज गेंदबाज डेनिस लिली उनसे खुश नहीं थे। लिली ने उनको सलाह दी कि वे अपना ध्यान बल्लेबाजी पर दें।
इसके बाद रमाकांत अचरेकर के अधीन सचिन की बल्लेबाजी फली-फूली। सचिन घंटों तक नेट प्रैक्टिस किया करते थे। अपनी स्कूली पढाई के दौरान ही सचिन अपनी बल्लेबाजी के कारण चर्चा का विषय बनने लगे थे।
वर्ष 1988 का स्कूली सीजन सचिन के लिए असाधारण था। इस सीजन की हर पारी में सचिन ने शतक लगाया। इसी सत्र के दौरान लॉर्ड हैरिस शील्ड इंटर स्कूल मैच में उन्होंने विनोद कांबली के साथ मिलकर 664 रनों की नाबाद साझेदारी की थी, जो वर्षों तक एक रिकॉर्ड रहा।
वर्ष 1987 में वानखेडे स्टेडियम में भारत और जिम्बाब्वे के बीच विश्व कप का मैच हुआ था। इस मैच में सचिन तेंदुलकर एक बॉल ब्वॉय थे। इसी दौरान महान सुनील गावसकर ने अपने पैड सचिन को दिए थे।
इस घटना के करीब 20 साल बाद सचिन ने सुनील गावसकर के 34 शतकों का रिकॉर्ड तोडा था।
शुरुआत
11 दिसंबर 1988 को सचिन ने अपने पहले प्रथम श्रेणी मैच में गुजरात के खिलाफ नाबाद 100 रन बनाए थे। उस समय सचिन की उम्र थी 15 वर्ष 232 दिन।
सचिन अपने पहले प्रथम श्रेणी मैच में शतक लगाने वाले सबसे युवा भारतीय खिलाडी बने। इसके बाद अपने पहले देवधर ट्रॉफी और फिर पहले दलीप ट्रॉफी मैच में भी उन्होंने शतक लगाया।
ईरान ट्रॉफी फाइनल में भी उन्होंने शतक लगाया। उन्होंने उस सीजन में मुंबई के लिए सबसे ज्यादा रन बनाए।
सचिन को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लाने का श्रेय राजसिंह डुंगरपुर को जाता है, जब उन्होंने 1989 के पाकिस्तान दौरे के लिए टीम में सचिन को जगह दी थी।
अपना पहला टेस्ट मैच उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ 1989 में खेला था। उस मैच में सचिन सिर्फ 15 रन बना पाए और वकार यूनुस ने उन्हें बोल्ड कर दिया था।
लेकिन उस मैच के दौरान जिस तरह उन्होंने पाकिस्तानी गेंदबाजों का सामना किया, उसकी क्रिकेट के जानकारों ने सराहना की।
स्यालकोट में हुए आखिरी टेस्ट मैच के दौरान सचिन को एक बाउंसर से चोट लगी। उनकी नाक से खून निकल रहा था, लेकिन उन्होंने मेडिकल सहायता लेने से इनकार कर दिया। ये था क्रिकेट के प्रति सचिन का समर्पण, जो आगे चलकर और निखरा।
पाकिस्तान दौरे पर सचिन का नाम उस समय और चर्चा में आया, जब उन्होंने एक प्रदर्शनी मैच के दौरान पाकिस्तान के चर्चित स्पिनर अब्दुल कादिर की जमकर धुनाई की।
सचिन ने सिर्फ 18 गेंदों पर 53 रन बनाए। उन्होंने अब्दुल कादिर के एक ओवर में 28 रन बनाए। सचिन ने अपना पहला शतक इंग्लैंड के खिलाफ वर्ष 1990 में ओल्ड ट्रैफर्ड में बनाया।
वर्ष 1991-92 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर सचिन ने अपने प्रदर्शन का लोहा मनवाया, जब उन्होंने सिडनी में नाबाद 148 रन बनाए। फिर पर्थ में भी उन्होंने शतक लगाया।
सुनहरा दौर
वनडे क्रिकेट में सचिन का सुनहरा दौर उस समय शुरू हुआ, जब 1994 में न्यूजीलैंड के खिलाफ मैच में उन्हें पारी की शुरुआत करने की जिम्मेदारी मिली। सचिन ने सिर्फ 49 गेंदों पर 84 रन बना डाले।
इसी साल उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कोलंबो में हुए एक वनडे मैच में अपना पहला वनडे शतक लगाया।
वर्ष 1996 के विश्व कप में सचिन सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाडी बने। हालांकि भारतीय टीम सेमी फाइनल में श्रीलंका से हार गई। इस मैच में भी सचिन ने भारत की ओर से सबसे ज्यादा रन बनाए।
सचिन दिनों-दिन निखरते जा रहे थे और क्रिकेट की दुनिया उनके बिना अधूरी लगने लगी। शारजाह में शेन वॉर्न की धुनाई हो कौन भूल सकता है।
बल्लेबाज के रूप में बेहतरीन सचिन को वर्ष 1996 में कप्तानी मिली। लेकिन सचिन कप्तानी में नहीं चल पाए। सचिन के बाद सौरभ गांगुली भारतीय टीम के कप्तान बने और भारतीय क्रिकेट का सुनहरा दौर शुरू हुआ।
इस सुनहरे दौर में सचिन वनडे हो या टेस्ट- दोनों में भारतीय टीम की रीढ बने रहे। वर्ष 2003 के विश्व कप में सचिन अपने प्रदर्शन के सुनहरे दौर में थे। लग रहा था कि 20 साल बाद भारत को विश्व कप जीतने से कोई रोक नहीं पाएगा।
लेकिन फाइनल में सचिन नहीं चले और एकतरफा फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को हरा दिया।
सपना
वर्ष 2007 के विश्व कप में सचिन भी बुरे दौर से गुजरे और भारतीय टीम भी। पहले ही दौर में टीम बाहर हो गई और सचिन की भी काफी आलोचना हुई और संन्यास की मांग भी उठी।
लेकिन सचिन इससे विचलित नहीं हुए। चार साल बाद जब भारतीय टीम ने विश्व कप जीता, तो सचिन का एक अधूरा सपना पूरा हुआ।
अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में हर खिलाडी की तरह सचिन का बुरा दौर भी आया। कभी टेनिस एल्बो तो कभी घायल होने के कारण वे कई बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर भी रहे। लेकिन हर बार निखर कर वापस आए।
सचिन के नाम इतने रिकॉर्ड हैं कि पूछिए मत। टेस्ट हो या वनडे बल्लेबाजी के करीब-करीब सारे रिकॉर्ड सचिन के नाम हैं।
सचिन को पद्म विभूषण मिल चुका है, महाराष्ट्र भूषण मिल चुका है, राजीव गांधी खेल रत्न मिल चुका है और वे विज्डन क्रिकेटर भी बन चुके हैं।
अपने 22 साल के क्रिकेट करियर में सचिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर आने वाली पीढियों को नाज होगा।