क्रिकेटर की कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना टेस्ट क्रिकेट है। टेस्ट के 'टेस्ट' में खरा उतरना ही हर क्रिकेटर का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है। इसमें खरा उतर कर क्रिकेटर खुद को बतौर क्रिकेटर पूर्ण मानता है। फटाफट क्रिकेट और दनादन क्रिकेट में तो बल्लेबाज जहां तहां बल्ला घुमा कर रन बनाने के फेर में रहते हैं।
सच तो यह है फटाफट क्रिकेट और दनादन क्रिकेट पॉप संगीत की तरह है और टेस्ट क्रिकेट खालिस शास्त्रीय संगीत। शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने के लिए जरूरत होती है साधना और धैर्य की। टेस्ट क्रिकेट में कामयाबी के लिए जरूरी है एकाग्रता और धैर्य से क्रीज पर टिकना। इस बात का अहसास भारतीय क्रिकेट के युवा तुर्क रोहित शर्मा को भी वक्त ने करा दिया।
रोहित की प्रतिभा और कौशल का तो हर कोई कायल था और है। उनके साथ बस दिक्कत यह रही कि वह एकाग्र न होकर बीच में अक्सर राह भटक गए। सचिन तेंडुलकर के टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कहने के शेर के बीच रोहित कोलकाता में अपने टेस्ट करियर का आगाज सेंचुरी से करने से पहले तक केवल वन डे में ही कामयाब हो पाए थे। रोहित यहीं नहीं थमे और अपने घर मुंबई के वानखेड़े मैदान पर अपने दूसरे टेस्ट की पहली पारी में शानदार सेंचुरी जड़ इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। इस सीरीज के लिए रोहित शर्मा को मैन ऑफ द सीरीज चुना गया।
एक मुंबईकर यानी सचिन की जगह लेने के लिए सपनों के शहर से एक और नए सितारे का उदय हो गया। रोहित ने उतार चढ़ाव खूब झेले हैं। एक वक्त तो यह भी आया कि जब वह वन डे में भी रनों के लिए तरस गए। मुंबई इंडियंस की आईपीएल में कप्तानी से रोहित पर ज्यादा जिम्मेदारी आ गई। इससे ही रोहित ने खुद और टीम को मुश्किल में धैर्य से अपनी टीम को संकट से निकालने का शउर सीखा। अपनी कप्तानी में रोहित ने मुंबई इंडियन को आईपीएल-4 खिताब और चैंपियंस लीग खिताब जितवाए। दरअसल जिम्मेदारियों ने रोहित के खेल को निखारा। बनाया। जिम्मेदारियों की कसौटी की तप कर रोहित जैसा सोना कुंदन बन कर निखरा।
खास टेलैंट
रोहित एक लिहाज से लकी हैं कि भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को विराट कोहली की तरह हमेशा उनकी प्रतिभा और कौशल पर यकीन रहा है। माही ने भारत के क्रिकेट पंडितों की तरह हमेशा रोहित को विराट की तरह खास टैलेंट माना। खैर देर आए, दुरुस्त आए। 108 वन डे में खेलने के बाद 26 बरस की उम्र में कोलकाता मे उन्हें अपने टेस्ट करियर का आगाज करने का मौका मिला।
रोहित ने अपने टेस्ट करियर का आगाज ईडन गार्डन में सेंचुरी लगा कर किया। रोहित भारत के टेस्ट इतिहास में सेंचुरी से आगाज करने वाले 14वें बल्लेबाज बन गए। उनसे पहले अपने टेस्ट करियर का आगाज सेंचुरी के साथ शिखर धवन (187) ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ किया था। रोहित (177) टेस्ट करियर का आगाज कर सेंचुरी के साथ करने में रन बनाने में धवन के बाद दूसरे नंबर पर हैं।
रोहित के पास इससे पहले 2010 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ उनकी जन्मस्थली नागपुर में अपने टेस्ट करियर के आगाज का मौका मिला था। बदकिस्मती से इस टेस्ट की सुबह रोहित वार्मअप सेशन में रिद्बिमान साहा से टकरा कर चोट खाकर बाहर हो गए थे। लबे इंतजार के बाद टेस्ट क्रिकेट में स्थान पाने में रोहित ऑस्ट्रेलिया के माइक हसी को प्रेरणा मानते हैं। हसी ने 30 बरस की उम्र में टेस्ट करियर का आगाज सेंचुरी जड़ कर किया। उन्हीं से प्रेरणा पाकर रोहित ने कोलकाता में करियर के अपने पहले ही टेस्ट में वेस्ट इंडीज के खिलाफ सेंचुरी ठोकी। अपने मुंबई में सीरीज के दूसरे व आखिरी टेस्ट में कामयाबी के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए रोहित ने सेंचुरी जड़ बता दिया कि आने वाला कल उनका है।
कलाई के जादूगर
रोहित मूलत: हैं हैदराबाद के । उनका जन्म संतरों के शहर नागपुर में हुआ। क्रिकेट का ककहरा रोहित ने मुंबई में कोच दिनेश लाड से सीखा। लाड खुद सचिन तेंडुलकर रमाकांत आचरेकर के शागिर्द रह चुके हैं। लाड भी क्रिकेट के सबसे विश्वसनीय फॉर्मेट टेस्ट क्रिकेट को सबसे बड़ी क्रिकेट मानते हैं। यही पाठ लाड ने रोहित को भी पढ़ाया। मुंबई क्रिकेट ने भारत को सुनील गावसकर और सचिन तेंडुलकर की तरह टेस्ट क्रिकेट के दो महानतम बल्लेबाज दिए हैं। विकेट पर टिक कर गेंदबाज को थकाने और फिर रन बनाना इन दोनों मुंबईकरों से बेहतर और कोई नहीं जान सकता है।
रोहित ने भी मुंबई के मैदानों पर अपनी क्रिकेट इसके लंबे प्रारूप यानी टेस्ट क्रिकेट के मुताबिक ढाली। कलाई के खूबसूरत इस्तेमाल में वह सही मायनों में भारत के कलाइयों के जादूगर रहे गुंडप्पा विश्वनाथ और मोहम्मद अजहरुद्दीन, वीवीएस लक्ष्मण की परंपरा के वारिस नजर आते हैं। इनके साथ ही रोहित को लंबे स्ट्रोक खेलना भी खूब आता है। दरअसल अपनी कलाइयों के कमाल से 'गैप' के भीतर से गेंद को निकालने का शउर उन्हें विश्वनाथ और अजहर की तरह खूब आता है।
रोहित की विकेटों के बीच तेज दौड़ अक्सर अजहर की फुर्ती की याद दिला देती है। यह भी एक संयोग है कि रोहित ने अजहर की तरह अपने टेस्ट क्रिकेट का आगाज ईडन गार्डन पर ही सेंचुरी के साथ किया। रोहित के टेस्ट करियर का यह तो अभी आगाज है। रोहित में एक बात सबसे खास है। वह तकनीकी रूप से विराट कोहली के साथ भारत के सबसे काबिल बल्लेबाजों में एक है। वह स्पिनरों के खिलाफ जिस तरह चहलकदमी करते हुए स्ट्रोक खेलते हैं उसी विश्वास से वह रफ्तार के सौदागरों के प्रमुख हथियार के बाउंसर पर पलटवार करते हैं।
रोहित के खेल में दरअसल अजहर के खेल का अक्स नजर आता है। वह अजहर की तरह कलाइयों की नफासत से स्ट्रोक खेलने के साथ तेज रन दौडऩे के साथ बेहतरीन फील्डर भी हैं। वह कामचलाउ बॉलर भी हैं और वक्त जरूरत वह अपनी उपयोगी ऑफ स्पिन से विकेट खासतौर पर वन डे में कप्तान को विकल्प देते हैं।
कप्तान माही के भरोसेमंद
कामयाबी के लिए क्रिकेट ही नहीं बल्कि किसी भी चीज में पुरुषार्थ के साथ किस्मत का रोल भी होता है। रोहित शर्मा को भी इस बात का अहसास अब भली भांति हो ही गया है। रोहित ने उतार चढ़ाव खूब देखे। 2011 में भारत की वन डे विश्व कप टीम में स्थान पाने और उसके बाद 2012 में वन डे में पांच पारियों में केवल 15 रन बनाने के बाद टीम से बाहर होने का दर्द रोहित ने झेला। रोहित ने घरेलू क्रिकेट में उतर कर लंबी पारियां खेली।
भारत के महान विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग के रंगत खोने के बाद कप्तान धोनी के भरोसे ने रोहित को वन डे टीम में जगह क्या दिलाई कि उन्होंने फिर बुलंदी को चूमने की ठान ली। शिखर धवन के सलामी जोड़ीदार के रूप में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ 83 रन की मैच जिताने वाली पारी खेल कर अपनी जगह टीम में पक्की की। दरअसल 2013 रोहित के लिए कामयाबियों की सौगात लेकर आया।
चैंपियंस ट्रॉफी रोहित शर्मा ने इंग्लैंड में मूव होती गेंदों को विश्वास से खेला। अब वन डे में उनकी और शिखर धवन की सलामी जोड़ी वन डे में दुनिया की सबसे कामयाब और नंबर 1 जोड़ी है। रोहित ने बागों के शहर बेंगलुरू में बल्ले से धमाल कर वन डे में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 209 की पारी खेल वन डे डबल सेंचुरी जडऩे वाला दुनिया का तीसरा बल्लेबाज बनने का गौरव हासिल किया। वह सचिन तेंडुलकर और वीरेंद्र सहवाग के बाद यह गौरव पाने वाले दुनिया के तीसरे बल्लेबाज हैं। इसके साथ ही वह 16 वन डे में 16 छक्के जडऩे वाले पहले बल्लेबाज बन गए।
कोलकाता में अपने करियर के पहले टेस्ट में पहला रन बनाने से पहले उन्होंने 13 गेंदें खेलीं। पूरी पारी में रोहित ज्यादा आक्रामकता दिखाने से बचे। इससे साफ है कि रोहित ने आक्रमण के साथ रक्षण के बीच आदर्श संतुलन बनाना सीख लिया है। सच है सब्र का फल मीठा होता। शायद यह बात रोहित को भी समझ आ गई है। यदि वह ऐसे ही खेलते रहे तो निश्चित रूप से वह वीवीएस लक्ष्मण के सही वारिस साबित होंगे।