साल 2011 वानखेड़े स्टेडियम विश्व कप का फाइनल सचिन-सहवाग पवेलियन लौट चुके थे। देश हाथ जोड़े और सूखे होंठ लिए टीवी पर नजरें गड़ाए था। सचिन और सहवाग के आउट होने के बाद गंभीर ने मोर्चा संभाल लिया था। गौती के जमते ही धीरे-धीरे स्कोरबोर्ड भी चलने लगा। वर्ल्ड कप का फाइनल अगर आपने देखा होगा, तो याद होगा कि गंभीर कैसे रन आउट होते-होते बचे थे। रन आउट से बचने के लिए गौती ने क्रीज में गोता लगा दिया था, उन्हें अपनी कीमती विकेट का अंदाजा था। वापस उठे और धूल में सनी जर्सी की परवाह किए बिना फिर भिड़ गए।
गंभीर ने 97 रन बनाए थे, वो 97 रन जिसने भारत विश्व चैंपियन बनने के लिए जमीन तैयार की। वो 97 रन जिसने धोनी को विनिंग छक्का लगाने की आजादी दी, लेकिन गंभीर को जो नहीं मिला वो था उसके 97 रन की सही कीमत। जीत के बाद धोनी ने ट्रॉफी उठाई, सचिन ने कंधे पर सवार होकर मैदान का चक्कर काटा, लेकिन गंभीर एक मजबूत दीवार की नींव की तरह जमीन में दबे रह गए, मिट्टी में सनी उनकी टी-शर्ट चमचमाती रात में लोगों के आंखों से ओझल हो गई। 97 रन के स्कोर पर क्लीन बोल्ड होने के बाद गंभीर ने दोनों हाथ हवा में उठा दिए थे, मानों कोई बहुत बड़ा मिशन निपट गया हो।