पाकिस्तान क्रिकेट एक बार फिर प्रशासनिक अराजकता और अंदरूनी खींचतान की वजह से सुर्खियों में है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) इन दिनों अपनी ही टी20 लीग पाकिस्तान सुपर लीग (पीएसएल) में मची स्वामित्व की जंग से जूझ रहा है। हालत यह है कि मैदान से ज्यादा चर्चा अब कोर्ट और बंद कमरों में हो रही है।
सियालकोट फ्रेंचाइजी में बवाल
समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया, हाल ही में नीलामी में खरीदी गई सियालकोट फ्रेंचाइजी में बहुमत हिस्सेदारी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सियालकोट की इस टीम को 185 करोड़ रुपये में एक कंसोर्टियम ने खरीदा था, जिसमें कामिल खान भी शामिल हैं।
मामला तब गरमाया जब एक प्रमुख हिस्सेदार मुहम्मद शाहिद ने पीएसएल के सीईओ सलमान नसीर को शिकायत भेजी। शाहिद का दावा है कि उनके पास फ्रेंचाइजी के 76% शेयर हैं, जबकि बाकी 24% हिस्सेदारी रखने वाले पार्टनर उनकी जानकारी और सहमति के बिना शेयर बेचने की कोशिश कर रहे हैं। विदेश में रहने वाले शाहिद ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक शेयरधारक अपने हिस्से से ज्यादा शेयर डंप करने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी लीग में स्वामित्व संरचना इतनी अस्पष्ट कैसे हो सकती है?
लाहौर कलंदर्स में भी दरार
विवाद सिर्फ नई फ्रेंचाइजी तक सीमित नहीं है। पीएसएल की जानी-मानी टीम लाहौर कलंदर्स में भी मालिकाना हक को लेकर परिवार के भीतर टकराव सामने आया है। फ्रेंचाइजी के मूल मालिकों में से एक फवाद राणा ने अदालत से अपने पक्ष में फैसला मिलने के बाद फिर से पीएसएल प्रबंधन को शिकायत दी है। अदालत में दायर याचिका में उन्होंने अपने भाइयों आतिफ राणा और समीर राणा पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उनकी कंपनी के शेयर उनकी जानकारी के बिना बेच दिए। कोर्ट ने फवाद राणा के पक्ष में फैसला सुनाया।
सवालों के घेरे में पीसीबी
लगातार सामने आ रहे इन विवादों ने पीसीबी की प्रशासनिक क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस लीग को पाकिस्तान क्रिकेट की आर्थिक रीढ़ कहा जाता है, वहीं उसकी फ्रेंचाइजी संरचना में पारदर्शिता और नियंत्रण का अभाव दिखाई दे रहा है। एक ओर मैदान पर प्रदर्शन की चिंता है, तो दूसरी ओर बोर्ड के सामने मालिकाना हक की कानूनी लड़ाइयां सिरदर्द बन चुकी हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे तो पीएसएल की साख पर भी असर पड़ सकता है।