स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अंशुल तलमले
Updated Wed, 20 Jan 2021 11:21 AM IST
नवदीप सैनी, वाशिंगटन सुंदर, मोहम्मद सिराज, शार्दुल ठाकुर और टी नटराजन
- फोटो : ट्विटर
नवदीप सैनी, वाशिंगटन सुंदर, मोहम्मद सिराज, शार्दुल ठाकुर और टी नटराजन
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बेशक ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने मैदान की मुश्किलों से जूझना सीखा था, लेकिन गाबा का अभेद्य किला ढहाने वाले युवा भारतीय खिलाड़ियों को तो जीवन की मुश्किलों ने ढाला है। वे ऐसे जीवन में पले जिसमें अच्छे जूते या क्रिकेट का सामान विलासिता कहलाता है। ट्रेनिंग के लिए सात-सात घंटे सफर कर घर से 90 किमी दूर जाना होता है। घर के मुखिया ऑटो चलाकर परिवार पालते हैं, तो खुद यह क्रिकेटर टेनिस बॉल क्रिकेट मैच खेल कर 300 रुपये कमाते हैं। जानिए क्रिकेट के इतिहास की सबसे यादगार श्रृंखला में से एक जीतने वाले यह खिलाड़ी तराशते जाते समय किस तरह घिसे और चमके
टी नटराजन: नये जूते खरीदने के लिए महीनों सोचते थे
अपनी मां के साथ ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ डेब्यू करने वाले नटराजन
- फोटो : ट्विटर
सालेम से 36 किलोमीटर दर चिन्नप्पमपट्टी के नटराजन के पिता थंगारासु करघा कारीगर थे। मां शांता एक छोटी सी खाने की दुकान चलाती हैं, करघे का काम छूटा तो पिता भी इसी दुकान में काम करने लगे। क्रिकेट का सामान खरीदना तो दूर की बात, जूते की एक नई जोड़ी खरीदने से पहले भी नटराजन को महीनों सोच-विचार करना होता था। 11 साल की उम्र में क्रिकेट से जुड़े नटराजन ने अपनी मेहनत से अपनी किस्मत बदली।
शार्दुल ठाकुर: रोजाना 180 किमी सफर करने वाली पालघर एक्सप्रेस
शार्दुल ठाकुर
- फोटो : ANI
मुंबई से 90 किमी दूर पालघर के शार्दुल को शुरुआती प्रशिक्षण के लिए मुंबई जाना होता था। इस महंगे शहर में रहना परिवार के लिए मुश्किल था। इसलिए 15 साल के शार्दुल सुबह साढ़े 4 बजे रेलवे स्टेशन पहुंच जाते। कई बार बोरीवली की डायरेक्ट लोकल ट्रेन नहीं मिलती तो विरार से गाड़ी बदलते हुए मैदान पहुंचते। रोज 180 किमी के सफर में सात घंटे लगते। रणजी ट्रॉफी में सलेक्शन के बाद उनका वजन भी बढ़ा जिसका असर खेल पर हुआ। उन्होंने 13 किलो वजन घटाकर घातक वापसी की।
सिराज: पिता नहीं रहे, फिर भी मैदान में रुके, उनका सपना साकार किया
अपने पिता के साथ मोहम्मद सिराज
- फोटो : ट्विटर
हैदराबाद में जन्मे मोहम्मद सिराज के पिता मोहम्मद गौस ने ऑटो रिक्शा चलाकर उन्हें पाला। वे अपनी सफलता को पिता के इसी कठिन परिश्रम का परिणाम मानते हैं। ऑस्ट्रेलिया दौरे के समय ही उनके पिता का निधन हुआ, लेकिन उन्होंने घर लौटने के बजाय मैदान पर रहकर पिता का सपना पूरा करना तय किया। कम अनुभव, पिता की मौत का गम, ऑस्ट्रेलिया के कुछ असभ्य दर्शकों के नस्लभेदी अपशब्दों को भुलाकर सिराज ने ब्रिस्बेन में पांच विकेट हासिल किए। यही एक बेटे का पिता को दिया असली सम्मान है।
वाशिंगटन सुंदर: पिता को प्रोत्साहित करने वाले से मिला नाम
वाशिंगटन सुंदर
- फोटो : instagram@washisundar555
हिंदू परिवार में जन्मे वाशिंगटन सुंदर को अपना नाम एक अच्छे क्रिकेटर रहे उनके पिता सुंदर ने दिया। वजह, पीडी वाशिंगटन नामक व्यक्ति थे, जिन्होंने उनके पिता को हमेशा क्रिकेट में प्रोत्साहित किया, आर्थिक सहयोग दिया। वाशिंगटन सुंदर बचपन से एक कान से सुन नहीं सकते, लेकिन यह कभी उनके खेल में बाधा नहीं बना।
नवदीप सैनी: खुद निकाला रास्ता
नवदीप सैनी
- फोटो : crictracker
हरियाणा के नवदीप सैनी के पिता अमरजीत सिंह राज्य सरकार में वाहन चालक हैं। आर्थिक सीमाओं की वजह से नवदीप को महंगी कोचिंग मिलना संभव नहीं था, न ही क्रिकेट के महंगे सामान खरीद पाते थे। नवदीप ने खुद इसका जरिया तलाशा। वे टेनिस बॉल क्रिकेट मुकाबलाें में हिस्सा लेने लगे, जिसके लिए उन्हें 300 रुपये प्रति मैच तक मिलता था।