बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब मयंक अग्रवाल का बल्ला घरेलू क्रिकेट में एक के बाद एक रनों का अंबार लगा रहा था। बावजूद इसके इंडिया कैप उनसे दूर थी। उन्हें खुद नहीं समझ में आ रहा था कि वह क्या करें। वह हताश थे और यह हताशा निराशा में बदलती जा रही थी। ऐसे में उनके कोच आर मुरलीधर ने उनसे कहा जो उनके बस में है वही करें। उनके हाथ में रन बनाना है और वह इसे जारी रखते हुए मेहनत नहीं छोड़ें। मयंक ने कोच की बात को गांठ में बांध ली और रोजाना नेट पर पांच सौ गेंदों को खेलने का लक्ष्य बना लिया। नेट पर वह बल्ले से मेहनत करते थे और नेट के बाहर निराशा से उबरने के लिए उन्होंने विपासना का सहारा लिया। कोच केमुताबिक इन दोनों ही बातों ने मयंक को डिगने नहीं दिया।