यही वो साल था जब दलीपसिंह को प्रतिष्ठित ससेक्स टीम की तरफ से कॉउंटी क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला। उन्होंने यहां 1926 से 1932 तक खेला और आखिरी साल में ससेक्स की कप्तानी भी की।
उन्होंने अपने पहले ही मैच में लीसेस्टरशायर के खिलाफ शानदार 97 रनों की पारी खेली हालांकि वो बस तीन रन से अपने चाचा रणजीतसिंह जी के डेब्यू मैच में शतकीय पारी की बराबरी करने से चूक गए। हालांकि इसके बाद दलीपसिंह यहीं नहीं रुके और एक के बाद एक शानदार शतकीय पारियां खेलते चले गए। उन्होंने तबीयत खराब होने से पहले प्रथम श्रेणी क्रिकेट के आठ सीजन में अपना खेल दिखाया और 50 शतकों की मदद से 15 हजार से अधिक रन बनाए।
दिल से जुड़ी एक बिमारी की वजह से उन्हें अपने क्रिकेट को कम उम्र में ही छोड़ना पड़ा लेकिन उससे पहले उन्होंने इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम की तरफ से 12 मैच खेले और तीन शतकों की मदद से 995 रन बनाए, इस दौरान उनका औसत भी 58.52 का रहा।
दलीपसिंह जी ने क्रिकेट के मैदान को छोड़ने से पहले कई कीर्तिमान भी बनाए और अपने खेल की बदौलत दिग्गजों की लिस्ट में शुमार हो गए। उन्होंने 1930 में एशेज में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ लॉर्ड्स के मैदान में मुश्किल में फंसी इंग्लैंड की टीम की तरफ से पांच घंटे बल्लेबाजी करते हुए 173 रन बनाए।
दलीपसिंह 1930 में अपने खेल के उच्च स्तर पर काबिज थे, यही वो समय था जब उन्होंने प्रथम श्रेणी टूर्नामेंट के एक मैच में मात्र पांच घंटे में ही तिहरा शतक जड़ दिया था। नॉर्थहैम्पटनशायर के खिलाफ मैच में पहले विकेट के गिरने के बाद दूसरे ही ओवर में बल्लेबाजी करने उतरे। मैच में एक छोर से ससेक्स के विकेट गिर रहे थे और दूसरे छोर पर दलीपसिंह टिके हुए थे। देखते-देखते उन्होंने पांच घंटे क्रीज पर बिता दिए और अपने चाचा रणजीतसिंह जी के ससेक्स की तरफ से बनाए गए सर्वाधिक रन के 29 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ गए। 235 रनों पर पांच विकेट गिरने के बावजूद ससेक्स की टीम ने सात विकेट के नुकसान पर 514 रन बनाए जिसमें 333 रन सिर्फ दलीपसिंह के थे, इस दौरान उन्होंने 33 चौके और एक छक्का भी लगाया। ससेक्स की तरफ से एक पारी में सर्वाधिक रन का उनका रिकॉर्ड 73 साल बाद 2003 में मरे गुडविन द्वारा टूटा।
दलीपसिंह भारत की राष्ट्रीय टीम की तरफ से कभी नहीं खेल पाए, उन्हें 1932 में नए बने भारतीय क्रिकेट बोर्ड की जिम्मेदारी लेने की पेशकश की गई थी और इंग्लैंड के खिलाफ मैच में नेतृत्व के लिए कहा गया था लेकिन उन्होंने अपने चाचा रणजीतसिंह जी के कहने पर इस पेशकश को ठुकरा दिया था।
उन्हें उनकी खेल और उपलब्धियों की बदौलत 1930 की पांच सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों की लिस्ट में शामिल किया गया था।
दिल की बिमारी की वजह से क्रिकेट मैदान से दूर रहने के बावजूद वे क्रिकेट से दूर नहीं रहे और इंग्लैंड और भारत दोनों के लिए सलाहकार और चयनकर्ता की भूमिकाएं निभाई। 1950 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया। 1954 में, वह सौराष्ट्र में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में तैनात हुए। उन्होंने अखिल भारतीय खेल परिषद के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया, एक ऐसा पद जो उन्होंने अपने निधन से कुछ महीने पहले लिया था।