ये सवाल आज क्रिकेट की दुनिया में हर किसी की जुबान पर है। इंग्लैंड का नौंवा विकेट जब गिरा तब इंग्लैंड को जीत के लिए 73 रन चाहिए थे। मैच इंग्लैंड की मुट्ठी से निकल चुका था। लेकिन क्रिकेट अनिश्चिताओं का खेल है ये कहावत आठ-दस साल में एकाध बार 100 फीसदी सच होती है।
बेन स्टोक्स ने अगली 42 गेंदों में मैच की कहानी ही पलट दी। इन 42 गेंदों में उन्होंने 7 छक्के लगाए, 4 चौके लगाए और चार बार 2-2 रन लिए। इस तरह बेन स्टोक्स ने 15 गेंदों पर 66 रन बनाए। बाकि की बातें इतिहास में और रिकॉर्ड बुक में दर्ज हैं। उन्होंने कुछ सिंगल लिए।
कई गेंदों को डॉट बॉल के तौर पर खेला। लेकिन 15 गेंद पर 66 रन वो भी तब जब आपके सामने हेजलवुड, पैट कमिंग्स और जेम्स पैटिंसन जैसे गेंदबाज पूरी ताकत से गेंदबाजी कर रहे हों करिश्मा ही है। बेन स्टोक्स की इस पारी के आगे टी-20 का रोमांच फीका पड़ गया।
2005 में भी एक ऐसा ही बेहद दिलचस्प मैच हुआ था। एशेज सीरीज के मैनचेस्टर टेस्ट की कहानी है। फर्क बस इतना है कि लीड्स में इंग्लैंड जीत के लिए बल्लेबाजी कर रही थी जबकि 2005 में गेंदबाजी। तब इंग्लैंड ने चौथी पारी में ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 423 रनों का बड़ा लक्ष्य दिया था।
रिकी पॉन्टिंग की करिश्माई पारी की बदौलत ऑस्ट्रेलिया ने आखिरी दिन तक मैच में जीत की उम्मीदें बांध रखी थीं। लेकिन जब निचले क्रम के बल्लेबाज जल्दी जल्दी आउट हो गए तो रिकी पॉन्टिंग अकेले पड़ गए। ये वो दौर था जब इंग्लैंड के लिए मैथ्यू होगार्ड, स्टीव हार्मिसन और एंड्रयू फ्लिंटॉफ जैसे दिग्गज गेंदबाज हुआ करते थे।
रिकी पॉन्टिंग भी आखिरकार 156 रन बनाकर नौवें विकेट के तौर पर आउट हो गए। इंग्लैंड की टीम को जीत दिखने लगी क्योंकि मैच में अब भी चार ओवर का खेल शेष था और उसे सिर्फ एक विकेट की दरकार थी।
क्रीज पर ब्रेट ली और ग्लेन मैक्ग्रा थे। ब्रेट ली तो फिर भी तेज गेंदबाजों का सामना कर लेते थे, लेकिन मैक्ग्रा आसान टारगेट थे। इंग्लैंड के गेंदबाजों ने सारे हथकंडे आजमा लिए, लेकिन 24 गेंद फेंकने के बाद भी वो आखिरी जोड़ी के तौर पर ब्रेट ली और ग्लेन मैक्ग्रा को विकेट से हटा नहीं पाए। ऑस्ट्रेलिया ने वो टेस्ट मैच ड्रॉ करा लिया।