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लोढ़ा समिति और बीसीसीआई की तनातनी, जानिए कहां से शुरु हुई कहानी

Mon, 02 Jan 2017 07:19 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला/ नई दिल्ली
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बीसीसीआई - फोटो : getty
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सुप्रीम कोर्ट ने नए साल की शुरुआत में ही अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को हटाकर बड़ा झटका दिया है। करीब डेढ़ साल से बोर्ड सुप्रीम के साथ आंख मिचौनी खेलता नजर आ रहा था। मगर बड़ा सवाल यह है कि मामला शुरु कहां से हुआ?
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पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब जनवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने क्रिकेट में पारदर्शिता लाने के लिए पूर्व प्रमुख न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में 3 सदस्यों की समिति का गठन किया। समिति को कहा गया कि वो भ्रष्टाचार, मैच फिक्सिंग, सट्टेबाजी जैसे बड़े मुद्दों से पार पाने के लिए सुझाव दें।

करीब एक साल निरीक्षण और जांच के बाद जनवरी 2016 में लोढा समिति ने कई बड़े मुद्दों पर सुझाव दिए। इनमें कई सुझाव थे, जो बीसीसीआई के कई अधिकारियों के गले नहीं उतरे। लोढ़ा समिति ने एक राज्य को एक वोट, बीसीसीआई पदाधिकारियो की उम्र सीमा 70 साल, मंत्रियों और नौकरशाहों को बीसीसीआई की सदस्यता खत्म करने की सिफारिशें दीं। इसके अलावा लोढ़ा समिति ने खिलाड़ियों का संघ बनाने की भी बात की।
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4 फरवरी 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बोर्ड को 3 मार्च 2016 तक लोढ़ा समिति की सभी सिफारिशों को लागू करना होगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि बोर्ड को इन सिफारिशों को लागू करने में दिक्कतें हो रही हैं, तो कोर्ट लोढा समिति के जरिए इन्हें लागू करवाएगा।
 

BCCI ने लोढ़ा समिति को दी थी खुली चुनौती

anurag thakur
2 मार्च 2016 को बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करते हए कहा बोर्ड समिति की कई सिफारिशों को लागू करने में असमर्थ है जिनमें एक राज्य का एक वोट, 70 साल की उम्र सीमा, सीरीज के दौरान विज्ञापनों पर रोक जैसी बातें शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति को इन सिफारिशों पर पुन:विचार करने को कहा और साथ ही बीसीसीआई को फटकार लगाई को वो पारदर्शिता और बदलाव नहीं चाहती।

18 जुलाई 2016 को कोर्ट ने बीसीसीआई को लोढ़ा समिति के सुझाव मानने और लागू करने के लिए 4 से 6 महीने का वक्त दिया। साथ ही कोर्ट ने जस्टिस लोढा को सिफारिशें लागू करने की प्रक्रिया कि देखरेख करने के लिए कहा। इसके बाद मुंबई क्रिकेट संघ के अध्यक्ष शरद पवार ने इस्तीफा दे दिया।

सितंबर 21 को बीसीसीआई ने अपनी वार्षिक साधारण सभा बुलाई पुरुष, महिला और जूनियर टीम के लिए 5 सदस्यों की चयन समिति नियुक्त कर लोढा समिति के सिफारिशों को चुनौती दी। समिति ने 3 सदस्यों की चयन समिति नियुक्त करने के लिए कहा था।

इसके बाद चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने तल्ख शब्दों ने बीसीसीआई को कहा कि सभी सिफारिशों को लागू करे। कोर्ट ने एक सप्ताह का समय देते हुए कहा कि हमें मालूम है कि फैसले कैसे लागू करवाने हैं। इसके बाद 3 अक्टूबर 2016 को लोढा समिति ने येस बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र से बीसीसीआई के फंड पर रोक लगवा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को लगाई कड़ी फटकार

शशांक मनोहर - फोटो : getty
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा कि राज्य संघों को तब तक पैसा नहीं मिलेगा, जब तक वो समिति की सिफारिशों के लिए स्वीकृति पत्र नहीं देते। इसके अलावा बोर्ड ने कहा कि बीसीसआई सिफारिशों को लागू करने में दिक्कतें पैदा कर रहा है और अपने अड़ियल रवैये पर कायम है। कोर्ट ने इन आदेश की अवमानना माना।

18 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई ने पुन:विचार याचिका को खारिज कर दिया। चार दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया की बोर्ड बिना समिति की मंजूरी लिए किसी भी वित्तीय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता।

पूरे मामले की गाज भारत-न्यूजीलैंड और भारत-इंग्लैंड सीरीज पर गिरी। पैसों की कमी के चलते बोर्ड ने कहा कि दोनों दौरे पैसों की कमी के कारण खटाई में पड़ सकते हैं।

बीसीसीआई ने इस लड़ाई में आईसीसी को भी खींच लिया। आईसीसी प्रमुख शशांक मनोहर ने कहा है कि 7 अगस्त को अनुराग ठाकुर ने आईसीसी से पत्र मांगा था कि क्या ईसीसी सीएजी (CAG) द्वारा नियुक्त ऑडिटर को सरकारी हस्तक्षेप मानता हैं या नहीं। जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बीसीसीआई को फटकार लगाई।
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कम नहीं हुई हैं ठाकुर की मुश्किलें, जाना पड़ सकता है जेल

Supreme Court hearing on Saturday - फोटो : Getty Images
साथ ही कोर्ट ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को गलत बयानी के मामले में सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगने के लिए कहा। बीसीसीआई की लीगल सेल ने ठाकुर की ओर से माफीनामा तैयार करना शुरू कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने 15 दिसंबर को सुनवाई में अनुराग ठाकुर के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया था। अदालत ने प्रथमदृष्टि पाया कि अनुराग ठाकुर ने अदालत को गुमराह करने की कोशिश की है। चीफ जस्टिस ने यहां तक कह दिया था कि अगल अदालत के समक्ष गलत बयानी का मामला साबित होता है तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। इसके बाद बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने ठाकुर की ओर से माफी मांगे जाने की बात कही थी।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी 2017 को कड़ी कार्यवाही करते हुए बोर्ड अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को उनके पद से हटा दिया। साथ ही ठाकुर पर परजूरी (झूठी गवाही और सूबत देने) का केस चलता रहेगा और यदि यह साबित हो गया, तो उन्हें जेल भी हो सकती है।
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