आईसीसी ने भले ही डे-नाइट टेस्ट क्रिकेट को हरी झंडी दे दी हो लेकिन बीसीसीआई इसके पक्ष में नहीं है। बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इसे सबसे पहले हमने ही 1997 में घरेलू क्रिकेट में आजमाया था लेकिन हमारा अनुभव सही नहीं रहा। बीसीसीआई के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी रत्नाकर शेट्टी ने कहा, ‘सबसे पहले इसका प्रयोग हमने ही किया था लेकिन हमारा अनुभव ठीक नहीं रहा। फिलहाल डे-नाइट क्रिकेट की हमारी कोई योजना नहीं है।’
गौरतलब है कि बीसीसीआई ने 1997 में मुंबई और दिल्ली के बीच रणजी ट्रॉफी का फाइनल मैच डे-नाइट कराया था। लेकिन, अत्यधिक ओस और नियमित अंतराल पर सफेद गेंद के बदले जाने के कारण गेंदबाजों को काफी परेशानी हुई थी। पांच दिवसीय इस मैच में दो पारी ही हो सकी।
मुंबई ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 630 रन बनाए और दिल्ली को आखिरी दिन 559 रन पर समेट दिया। पहली पारी की बढ़त के आधार पर दिल्ली की टीम विजेता घोषित हुई थी। हालांकि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया शुरू में आईसीसी के इस फैसले से सहमत था लेकिन बुधवार को उसने भी कहा कि उपयुक्त गेंद तलाश किए बिना इसका आयोजन फिलहाल ठीक नहीं रहेगा।
गिलक्रिस्ट भी खिलाफ
ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज एडम गिलक्रिस्ट डे-नाइट टेस्ट के खिलाफ हैं। गिली ने कहा कि क्रिकेट के इस सबसे लंबे प्रारूप के पारंपरिक स्वरूप के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। मुझे टेस्ट का परंपरागत स्वरूप ही भाता है और मुझे नहीं लगता कि अधिकांश खिलाड़ियों की राय मुझसे अलग है।
गिली ने बताया कि कई लोग वन-डे और टी-20 का समर्थन करते हैं लेकिन टेस्ट ही असली क्रिकेट है और यह अपना अस्तित्व बचाए रखने में कामयाब रहेगा। कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया में मैंने दिन-रात के प्रथम श्रेणी मैच खेले थे। लेकिन दोपहर के बाद स्थितियां समान नहीं रहती हैं। अभी तक यह नहीं कह सकते कि लाल गेंद के साथ दूधिया रोशनी में खेल सकते हैं या नहीं। रात की परिस्थितियां पूरी तरह अलग होंगी।’