दुनिया भर के पर्यावरणविद यह मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन विश्व की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्या है, लेकिन अभी तक इसके समयोचित समाधान का कोई विश्वसनीय कार्यक्रम भी सामने नहीं आया है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की समस्या बढ़ रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे टिपिंग पॉइंट कुछ वर्षों बाद आ जाएंगे, जिसके बाद यह समस्या हाथ से बाहर निकल जाएगी। इस आशंका को देखते हुए तत्काल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर ध्यान देना जरूरी है। जो समाधान आज असरदार हो सकते हैं, संभव है, कल उनकी यह क्षमता ही न रहे। संयुक्त राष्ट्र का अध्ययन बताता है कि वर्ष 1990 तक इस समस्या की गंभीरता का पता भली-भांति लग चुका था, लेकिन 2009 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी होने के बजाय 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस तरह बहुत महत्वपूर्ण और मूल्यवान समय यों ही गंवा दिया गया।
वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने बताया कि जिस हिसाब से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है, उस हिसाब से तो इस शताब्दी के अंत तक तापमान वृद्धि 2.5 से पांच डिग्री सेल्सियस तक हो जाएगी। वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन से कुछ पहले जलवायु परिवर्तन व स्वास्थ्य पर लांसेट आयोग ने ताजा उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर बताया कि दुनिया शताब्दी के अंत में चार डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रही है, जो बहुत बड़ी तबाही का सूचक है।
बहुचर्चित पेरिस सम्मेलन में विभिन्न देशों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के अपने लक्ष्य व कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वहां यह भी स्पष्ट हो गया कि विकसित और धनी देश अपनी विशिष्ट जिम्मेदारियों से दूर जा रहे हैं। चूंकि अत्यधिक ग्रीनहाउस गैस यही देश उत्सर्जित करते हैं, अतः यह भरोसा हुआ था कि इस समस्या के समाधान के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से विकसित देश ही उठाएंगे। लेकिन बाद में धनी देश इस जिम्मेदारी से भागते नजर आए।
विकसित देश यह वायदा काफी समय से करते आए हैं कि वे वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर विकासशील और निर्धन देशों को उपलब्ध करवाने के लिए विशेष कोष की स्थापना करेंगे। पर इस संदर्भ में उचित प्रगति और सही इरादे अभी तक नजर नहीं आ रहे। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने कहा है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता दूर करने के लिए प्रतिवर्ष 1,000 अरब डॉलर खर्च करने की जरूरत होगी, जिसमें से लगभग दो-तिहाई राशि तो विकासशील और निर्धन देशों में खर्च करनी होगी। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने अनुमान पेश किया है कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने की तैयारी के लिए ही सालाना 150 अरब डॉलर की जरूरत होगी। इन दो अनुमानों की तुलना में देखें, तो विकसित देशों का वायदा बहुत कम है और उसे पूरा करने की तैयारी भी नजर नहीं आ रही। ऐसे में, पर्यावरण के मोर्चे पर ज्यादा नुकसान तो विकासशील देशों को ही भुगतना पड़ेगा। साफ है कि जलवायु परिवर्तन की स्थिति चिंताजनक है। जन आंदोलन इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, पर वे इस स्थिति में हैं ही नहीं। अतः जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता बढ़ाना अब बहुत आवश्यक हो गया है।