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नेकर बदली, लाठी भी छोड़ दीजिए

Tue, 15 Mar 2016 12:57 PM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ - फोटो : Getty Images
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आखिर हठवाद छोडना पड़ा। आरएसएस थोड़ा लचीला हुआ है। आरएसएस के स्वयंसेवकों को उत्सवों में खाकी ड्रेस की जगह पेंट पहनने की अनुमति दी गई है। संघ की ड्रेस बदलने पर अभी पूरी सहमति शायद नहीं बन पाई है, इसलिए शाखाओं में अभी पुरानी ड्रेस ही पहनी जाएगी। लेकिन संघ किसी स्तर पर ही सही ड्रेस बदलाव के लिए तैयार हुआ है। संभव है कि संघ में ही कुछ लोग परिधान के इस बदलाव से सहमत न हो। इसलिए एक बार नागौर के फैसले में बदलाव करते हुए कहा गया है कि ड्रेस का यह बदलाव केवल उत्सवों तक ही सीमित रहेगा। आरएसएस के अंदर ही न जाने कितने स्वयंसेवक रहे होंगे जो मन ही मन सोचते रहे होंगे कि यह बड़ी नेकर ठीक नहीं। ड्रेस बदलनी चाहिए। खासकर तब जबकि इस संगठन में अस्सी फीसदी से ज्यादा स्वयंसेवक चालीस साल से कम उम्र के कहे जाते हैं। खासकर वो युवा जो नई पीढ़ी के हैं। भले ही वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धारा से ओतप्रोत हो लेकिन आधुनिकता की बयार से वह कैसे अछूते रह सकते हैं। वो  युवा जो आधुनिक संचार तकनीक से जुड़े हैं , शाम को मॉल में जाते हैं। आधुनिक थियेटरों में पिक्चर देखते हैं, ब्रांड के कपड़े पहनते हैं, वह स्वयंसेवक भी हो सकते हैं। तब ऐसे में अनुशासित आरएसएस में भले सीधे सीधे न कहा गया हो लेकिन ड्रेस बदलने के लिए अकुलाहट कइयों के मन में रही होगी। भले ही काली टोपी और खाकी नेकर वाली ड्रेस संघ की शाखाओं और विशेष अवसरों मं ही पहनी जाती रही है। लेकिन शहरों कस्बों में गुजरते स्वयंसेवकों के मन की थाह लेकर ही आरएसएस  फिलहाल अपने उत्सवों में  खाकी नेकर की जगह भूरी पेंट अपनाने पर सहमत हुआ है।
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आखिर राजस्थान के नागौर शहर में आरएसएस ने  पहले चरण के रूप में ही सही , यह फैसला ले ही लिया कि ड्रेस में बदलाव किया जाए। आरएसएस पर जो राजनीतिक दल दक्षिणपंथी धारा के चलते आक्षेप लगाते रहे हैं। उसमें केवल विचारों पर ही आरएसएस को नहीं घेरा गया बल्कि स्वयंसेवकों की खास ड्रेस जिसमे बड़ी खाकी नेकर को भी व्यंग का माध्यम बनाया गया। आरएसएस को पसंद न करने वाले स्वयंसवेकों के लिए नेकर वाला का संबोधन ही करते रहे। वो पत्र पत्रिकाएं जो वामपंथी विचारधारा पर चलती रही हैं, उनमें आरएसएस के स्वयंसेवक की ड्रेस पर कार्टून बने। आरएसएस की ड्रेस को लेकर व्यंग चुटकियां की जाती रही। यहां तक कहां गया कि आरएसएस वाले जिस नेकर को पहनते हैं वह भारतीय परिधान नहीं। इस ड्रेस कोड का मिलान यूरोंप के कुछ अतिवादी संगठनों से किया गया। लेकिन आरएसएस ने इन आरोपों की परवाह नहीं की।

आखिर इसमें ऐसा क्या था। 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना अधिवेशन में इस पर भी विचार हुआ था कि स्वंयसेवकों की ड्रेस क्या हो। आजादी की लड़ाई के उस माहौल में कुर्ता, धोती आदि पर भी विचार हुआ लेकिन गुरूजी गोलवरकर का आग्रह खाकी नेकर, काली टोपी और फौजी जूतों को लेकर था। यह ड्रेस ही स्वीकार कर ली गई। खाकी कमीज,  खाकी नेकर के पीछे यही दृष्टिकोण था कि स्वयसेवक शाखाओं में व्यायाम करेंगे , खेल खेलेंगे, उनके लिए एक हल्की फुल्की पोशाक होनी चाहिए। नेकर भी एकदम चुस्त नहीं हो। हल्के फुल्के पोशाक के तौर पर इसे अपनाया गया।  ऐसा नहीं कि ड्रेस के साथ कोई बदलाव नहीं हुआ। खाकी कमीज को बदला गया।  पुलिस और डाकिए की ड्रेस भी खाकी होने की वजह से इतनी बदलाव किया गया कि खाकी कमीज की जगह सफेद या दूसरे रंग की कमीज पहनी जाए। लेकिन नेकर को लेकर कोई बदलाव नहीं था। उस समय की परिस्थितियों में खाकी नेकर व्यंग भी नहीं होते थे और समाज भी आधुनिकता के परिवेश में इतना नहीं आया था कि ढीली नेकर पहनकर कोई सड़कों पर चलने में सकुचाए। आगे 1973 में फौजी जूतों की जगह सामान्य जूतों का चलन हुआ। फिर आरएसएस के लोग इसी ड्रेस में नजर आने लगे। काली टोपी, सफेद कमीज, बेल्ट खाकी नेकर और साथ में लाठी।  बदलते समाज में खाकी नेकर को लेकर कितने ही व्यंग हुए, कितनी ही बातें चली लेकिन आरएसएस टस से मस नहीं हुआ।  नब्बे के दशक में ग्लोबलाइजेशन में दुनिया करीब होती गई और देश दुनिया का सामान बाजारों में आने लगा। फैशन की तेज बयार भी चली। तब लगने लगा था कि शायद  आरएसएस अपने ड्रेस कोड को बदल देगा। लेकिन संघ अपने परंपरागत विचारों और शैलियों में ही चलता रहा। यहां तक कि संघ के उच्च स्तर पर कभी ड्रेस कोड को लेकर कोई बात नहीं उठी न कहीं कोई बयान दिया गया। न यह बताया गया कि इस खाकी कमीज, खाकी पेंट, बेल्ट और फौजी जूतों के साथ एक स्वयंसेवक की कल्पना कहां से साकार हुई।
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करीब छह साल पहले संघ में इस पर सोच विचार हुआ कि क्या ड्रेस में कोई बदलाव किया जाना चाहिए। ड्रेस से सीधा आशय यहां नेकर से ही था। संघ अब उस कोई आवाज नहीं उठाई है, लेकिन संगठन के शीर्ष स्तर के लोगो ने इस भाव को महसूस किया कि कहीं न कहीं नए दौर में यह ड्रेस अब युवाओं को असहज लग सकती है। फिर इसमें बदलाव करने से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। यह कोई सिद्धांतो विचारों का बदलाव नहीं। दुनिया भर में सामाजिक, धार्मिक संगठन हैं जिनका अपना ड्रेस कोड होता है। समय समय में उसमें बदलाव होते रहे हैं। फिर ऐसा क्या कारण है कि संघ के लिए इसे छोडना मुश्किल होता। लेकिन संघ अपने में इतनी नाजुकता नहीं दिखाना चाहता था कि किसी टिप्पणी मजाक या आलोचना पर वह कोई फैसला लेने पर मजबूर दिखे। हम हैं और जिस रूप में हैं, वही हमारा अस्तित्व है, इसी धारणा को कायम रखते हुए छह सात साल का समय और निकल गया। इस बीच कई बार चर्चा चली कि संघ स्वंयसेवकों की ड्रेस बदली जा रही है। लेकिन संघ के शीर्ष स्तर पर कोई टिप्पणी नहीं की गई। अब नागौर में हुए फैसले के बाद स्वयंसेवक कुछ आयोजनों में बदले रूप में दिखेंगे। वह स्वयंसेवक पेंट में होंगे। संघ पर फिरकी लेने वालों के लिए अब नेकर वाला की जगह नए मुहावरे गढने का समय अभी थोड़ा दूर है। क्योंकि शाखाओं में स्वयंसेवक नैकर में ही दिखेंगे।

सवाल केवल नेकर को बदल कर पेंट पर आने का नहीं।  संघ को अपनी लाठी भी छोडनी चाहिए। आखिर लाठी किसके लिए। क्या शरीर स्वस्थ रखने के लिए डंड चालन। संघ के लोग कहते रहे हैं कि लाठी आत्मसुरक्षा के लिए हैं। उनके आलोचक चिढाने के भाव में पलट कर कहते हैं कि जमाना तलवार काभी नहीं रहा, तोप राकेट का है, लाठी क्या काम आएगी। ये तो व्यंग में कही गई बातें हैं। लेकिन सीधा आशय यही है कि संघ के स्वयंसेवक देश में किसी विपत्ति के समय मदद करते हुए नजर आते हैं। बाढ, भूकंप, किसी भी आपदा के समय स्वयंसेवकों की टोलियां दिखती हैं। किसी भी संगठन की तुलना में वह भी बढ़ चढ कर मदद मेंआगे आते हैं। व्यवस्थित काम करते हैं। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों की छवि इस रूप में ही गढ़ी गई कि यह एक धर्म की रक्षा के लिए अपने अति आग्रहों के साथ खड़ा हुआ संगठन है। इसमें आरएसएस का भी अपना दोष है। आरएसएस के  मीडिया से दूर रहने, उठते संवादों , आरोपों के जवाब न देने और समाज से सीधे मुखर न होने से इसके सशंय बने रहे। सीधे साथ में राजनीति में न रहते हुए भी भाजपा को निर्देशित करने वाला संगठन बना रहा। बेशक आरएसएस, बजरंग दल, विहिप की तरह उत्तेजक नारों से बचता रहा। लेकिन वामपंथी धारा कांग्रेस समाजवादियो ने  दक्षिणपंथी सोच के लिए इनमें आरएसएस को ही सबसे ज्यादा निशाने पर लिया।

आरएसएस ने अपनी हिंदूवादी छवि के साथ ही था। भले ही आरएसएस यह भी बताता रहा कि उसमें देश के प्रति निष्ठा रखने वाले, अपने मूल्यों की चिंता करने वाले मुस्लिम भी इससे जुड़े हैं। लेकिन मूल में यह एक  प्रबल हिंदूवादी संगठन ही रहा। ऐसा संगठन जो धर्मातर की किसी भी घटना को सुन भर लेने से विचलित हो जाता है। ऐसा संगठन जो बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को लेकर तीखे शब्द कहता है। ऐसा शब्द जो यहां के प्रतीक धार्मिक अनुष्ठान, हिंदू स्वाभिमान से जुड़े लोगों , देश के बलिदानियों और प्रतीक पुरुषों की जन्मतिथि भव्यता से मनाने में यकीन करता है। पुण्यतिथि पर याद करता है। आरएसएस ने जो ड्रेस बदली है, वह उसकी अपनी सोच है। और ऐसा भी नहीं कि जिस ड्रेस नेकर को बदला है वह आरएसएस के लिए कोई लज्जा का विषय रहा हो। जिसे बदलना ही चाहिए था।  ड्रेस पर नहीं, एक संगठन समाज में रचनात्मकता के साथ खड़ा हो। अपनी आस्था, परंपराओं और एक राष्ट्र की मजबूती की अपेक्षा करना अच्छा पक्ष है, लेकिन इन लक्ष्यों के लिए सहज होकर भी आगे बढा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में सहजता एक बडे गुण के रूप में है। खासकर युवा पीढ़ी अब किसी तरह का टकराहट नहीं चाहती। सामाजिक कामों में गहनता से जुड़ कर आरएसएस कई आक्षेपों का जवाब दे सकती है।  क्या बदली ड्रेस के साथ संघ अपने में किसी तरह बदलाव की ओर बढ़ रहा है।
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