यह एक ऐसा दर्द है, जिसे अब तक कोई नाम नहीं दिया गया है। भारत 7.5 फीसदी विकास दर के साथ सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिक्स साथियों के मुकाबले इसने बेहतर प्रदर्शन किया है। फिर भी अर्थव्यवस्था में बेचैनी और संदेह है। उच्च विकास दर की सुर्खियां जमीनी हकीकत से मेल नहीं खातीं। इस हताशा की मुख्य वजह विकास दर और रोजगार सृजन के बीच बढ़ी खाई है। नीति निर्माताओं की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे विकास की महत्वाकांक्षा के साथ रोजगार की आकांक्षा और बढ़ती युवा आबादी की आय में तालमेल बिठाएं।
हाल ही में नीति आयोग ने रोजगार सृजन की अनिवार्यता को स्वीकारा है। उसने एक प्रेजेंटेशन दिया है कि वह वर्ष 2032 में भारत को कहां देखता है। इस प्रेजेंटेशन का शीर्षक है-क्रिएटिंग ए मूवमेंट फॉर चेंज (बदलाव के लिए एक आंदोलन), जिसमें लक्ष्य और एजेंडे को सूचीबद्ध किया गया है। अमूमन ऐसे दस्तावेजों में पांच, दस या पच्चीस वर्ष की अवधि रखी जाती है, पर इस योजना की अवधि 16 वर्ष रखी गई है। आप इसे मिशन 2032 भी कह सकते हैं, मोदी सरकार की व्यापक आकांक्षा।
इसमें राजनीतिक रूप से व्यवहार्य आकांक्षा और 'क्या करना है' पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसमें कल्पना की गई है कि 2032 तक भारत सौ खरब की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसमें 2032 तक 17.5 करोड़ यानी 1.09 करोड़ सालाना रोजगार पैदा करने और गरीबी रेखा से नीचे आबादी न होने का लक्ष्य रखा गया है।
प्रमुख चुनौती रोजगार सृजन और भारत की जनसांख्यिकी का मूल्यांकन करने की है। पिछले एक दशक में हर साल अर्थव्यवस्था में एक करोड़ से ज्यादा रोजगार चाहने वाले जुड़ते रहे हैं। वर्ष 2050 तक 28 करोड़ अतिरिक्त लोग इसमें जुड़ेंगे, क्योंकि 2050 तक कार्यशील आबादी 86 करोड़ से बढ़कर 1.1 अरब हो जाएगी।
रोजगार सृजन के मामले में भारत का प्रदर्शन कैसा रहा है? रोजगार के आंकड़े को कई कारक प्रभावित करते हैं-पहली बात यह कि 85 फीसदी श्रमिक अनियोजित क्षेत्र में है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 1991 से 2013 के बीच चीन के श्रमबल में 24.1 करोड़ लोग जुड़े, जबकि मात्र 14.4 करोड़ रोजगार का सृजन हुआ। इस दौरान भारत के श्रमबल में 30 करोड़ लोग जुड़े, पर 14 करोड़ रोजगार ही पैदा हुआ। यानी भारत में आधे से भी कम रोजगार पैदा हुआ। 1999 से 2004 के बीच भारत में करीब छह करोड़ रोजगार पैदा हुआ। जबकि 2005 से 2010 के बीच 30 लाख से भी कम रोजगार सृजन हुआ। पिछले महीने छठी आर्थिक जनगणना की रिपोर्ट आई, जिसके मुताबिक, वर्ष 2005 से 2013 तक आठ वर्षों के दौरान देश में 3.62 करोड़ यानी सालाना औसतन 45 लाख रोजगार का सृजन हुआ, जिनमें से लगभग आधे ग्रामीण प्रतिष्ठानों में थे।
बेशक उच्च विकास दर रोजगार सृजन में सक्षम बनाती है। भारत 10 फीसदी से ज्यादा की दर से विकास कर सकता है। लगातार तीन वर्षों तक नौ फीसदी से अधिक की विकास दर इसने हासिल की ही है। पर नौ फीसदी से अधिक की वह विकास दर 2003 से 2007 के बीच तेज वैश्विक विकास के बाद संभव हुई। चीन ही एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसकी औसत विकास दर 1991 से 2014 के बीच 9.8 फीसदी थी।
तब से दुनिया बदल गई है। दुनिया भर में मुद्रा, वस्तु, बॉन्ड्स और शेयर बाजार में घबराहट है। लगातार चार वर्षों तक विभिन्न एजेंसियां वैश्विक विकास के पूर्वानुमान को घटाती रही हैं। ज्ञात पर अज्ञात भारी है। लगता है कि अनिश्चितता ने स्थायी बसेरा कर लिया है। इसकी मुख्य वजह विश्व की बदलती जनसांख्यिकी है। 2050 तक विश्व की आबादी 9.7 अरब को छू लेगी। विकसित क्षेत्रों में आबादी में मुश्किल से 30 करोड़ की बढ़ोतरी होगी, जबकि कम विकसित क्षेत्रों में जनसंख्या में दो अरब से ज्यादा की वृद्धि होगी। विकसित देशों में कामकाजी लोगों की आबादी घट रही है। इससे उपभोग और निवेश में कमी हो रही है, जिससे आमदनी में वृद्धि सुस्त है। इसके विपरीत कम संसाधनों वाले कम विकसित देश में कामकाजी आबादी में उछाल देखने को मिलेगा। जाहिर है, कामकाजी आबादी के लिए अवसर बढ़ेंगे। इस जनसांख्यिकीय उभार का लाभ उठाने के लिए पहले इसे भोजन, फिर शिक्षा, हुनर और रोजगार उपलब्ध कराना होगा।
नीति आयोग द्वारा पेश की गई योजना उस नौकरशाहों की समिति द्वारा तैयार की गई है, जिसका गठन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बदलाव लाने के लिए आइडिया बैंक के रूप में किया है। अधिकारियों के साथ अनौपचारिक बातचीत में इस स्तंभकार ने बताया कि विकास की संभावना समाधान में ही अंतर्निहित है। जैसे कृषि उत्पादों के लिए राष्ट्रीय ग्रिड का निर्माण, जिसकी हाल में घोषणा हुई है, किसानों को बाजार से जोड़ेगा, जिससे न सिर्फ रोजगार पैदा होंगे, बल्कि विकास भी होगा।
छतों पर सौर पैनल लगाने के लिए वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन तथा पेयजल प्रबंधन स्टार्ट अप से रोजगार पैदा होंगे और विकास को गति मिलेगी। समय-सीमाबद्ध भर्ती प्रक्रिया से बेरोजगारी खत्म की जा सकती है। वर्ष 2012 से देश भर में शिक्षकों और पुलिसकर्मियों के 1.1 करोड़ पद खाली हैं। यदि सरकार गैरअधिसूचित और गैरप्रशासित शहरों को नगरपालिकाओं में बदलने के लिए एक बार अनुदान देती है, तो इससे न केवल नियोजित शहरीकरण होगा, बल्कि क्षमता निर्माण के साथ रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा।
अवसरों की कमी नहीं है। साफ है कि भारत को मानवीय और भौतिक संरचनाओं में निवेश करने की जरूरत है। इसके लिए संरचनागत सुधार जरूरी हैं। सबसे अहम जरूरत प्रशासन के ढांचे को व्यवस्थित करने, वित्त पोषण करने एवं राज्यों को सत्ता हस्तांतरित करने की है। मोदी सरकार की इस भव्य महात्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए व्यापक सहयोग की जरूरत है।
-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक