तीन-चार महीने पहले तक भी माना जा रहा था कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आसानी से लौट आएंगी। लेकिन छह चरणों वाले विधानसभा चुनाव के पांचवें चरण के अंत में अनेक लोग यह मान रहे हैं कि सत्ता में लौटने के लिए दीदी को काफी संघर्ष करना होगा। ममता ने पिछले पांच वर्षों में सख्ती से पश्चिम बंगाल पर शासन किया, गरीबों के लिए कार्यक्रम चलाने के साथ ही हिंसक तरीका अपनाकर वाम मोर्चे को उखाड़ फेंका, तो वाम दलों के बाहुबली उनके साथ हो लिए। लेकिन वही ममता इस विधानसभा चुनाव में खुद को बैकफुट पर पा रही हैं। ममता बनर्जी देश की संभवतः अकेली महिला नेत्री हैं, जो अपने बूते पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में सत्ता के शीर्ष पर पहुंची हैं। वह न किसी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं, न उनका कोई राजनीतिक गुरु है और न ही जयललिता और मायावती की तरह, जिन्हें एमजीआर और कांशीराम की पार्टी विरासत में मिली, उन्हें विरासत में कुछ मिला है। वर्ष 1997 में कांग्रेस से नाता तोड़कर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, फिर कांग्रेस को बंगाल की राजनीति से बेदखल कर दिया। इसके बाद 2011 में दीदी ने उस वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंका, जो 34 वर्षों से सत्ता में थी।
उनका राजनीतिक भविष्य तय करने के अलावा इस बार का चुनाव यह भी तय करेगा कि क्या कीमियागीरी से अंकगणित को मात दी जा सकती है। हाल के हफ्तों में मिले तमाम झटकों के बावजूद ममता अब भी जननेत्री हैं। खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब उनका नाम जपते हैं। वे उन कार्यक्रमों को गिनाते हैं, जो उन्होंने उनके लिए शुरू कीं, मसलन, दो रुपये किलो चावल, स्कूल में पढ़ने वाली 18 वर्ष तक की लड़कियों को 25,000 रुपये देने वाली कन्याश्री योजना, जिससे बाल विवाह में कमी आई और लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन मिला। चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए वह एक पोर्टेबल माइक्रोफोन के जरिये मंच से उतर कर लोगों से घुलती-मिलती हैं। हावड़ा के सांकराइल में तो वह उन महिलाओं और युवाओं की भीड़ में शामिल हो गईं, जो उनके हेलीकॉप्टर को हवा में देखते ही उत्साह में हाथ हिलाने लगे थे। वहां पारंपरिक तौर बिछने वाली लाल कालीन के बजाय उनके स्वागत में नीली कालीन बिछी हुई थी, क्योंकि नीला और सफेद उनकी पसंद का रंग है।
ममता बनर्जी की लड़ाई वहां कांग्रेस एवं वाम दलों के अप्रत्याशित गठबंधन से है, जो उस मध्यवर्ग को एक विकल्प दे रहा है, जिसने पिछले चुनाव में दीदी को वोट दिया था, लेकिन अब उसका तृणमूल से मोहभंग हुआ है। यही ममता की चिंता का कारण है। बंगाल में गरीब और अमीरों के बीच विभाजन स्पष्ट है। गरीबों का तबका ममता बनर्जी के साथ है, जबकि शिक्षित और संपन्न भद्रलोक परिवर्तन चाहता है।
दरअसल शारदा चिटफंड ने, जिसके चलते अपनी मेहनत की कमाई गंवाने वाले सौ लोगों ने आत्महत्या कर ली, ममता की छवि को नुकसान पहुंचाया है। मैंने पूरे चुनावी बंगाल की यात्रा की। न सिर्फ मैं कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में गई, बल्कि उत्तर चौबीस परगना जिले भी गई, जहां पिछली बार ममता ने विपक्षी दलों का सूपड़ा साफ कर दिया था। मैं उन लोगों से मिली, जिनके पैसे शारदा चिटफंड घोटाले के कारण डूब गए। फिर नारदा स्टिंग ऑपरेशन सामने आया, जिसमें तृणमूल कांग्रेस के मंत्री और सांसद कैमरे के सामने रिश्वत लेते देखे गए। यह घटना हालांकि 2014 की है, लेकिन इस स्टिंग को चुनाव प्रचार के दौरान जारी किया गया। और सबसे अंत में कोलकाता के भीड़ भरे इलाके बड़ा बाजार में विवेकानंद फ्लाईओवर के गिरने की घटना हुई, जिसमें स्पष्ट तौर पर सत्ता के गलियारों में पैठ बनाए ताकतवर निर्माण ‘गिरोहों’ ने घटिया सामान की आपूर्ति की थी। इन सबने ममता बनर्जी को दबाव में ला दिया और पार्टी के भीतर और बाहर उनके विरोधियों को एकजुट होने का मौका मिला।
बंगाल में इन दिनों एक महत्वपूर्ण सवाल लोगों के जेहन में है कि कांग्रेस और वाम दलों के गठजोड़ ममता बनर्जी को किस हद तक सत्ता में लौटने से रोक पाएंगे। दशकों से दोनों एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं और आज भी केरल में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। यह गठबंधन वास्तव में राज्य के लोगों को उत्साहित नहीं कर पाया है (माकपा के शासन की स्मृति धुंधली जरूर हुई है, पर मिटी नहीं है), लेकिन माकपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता उत्साहित हैं और उन्हें साथ काम करने में मुश्किल नहीं हो रही। मानस भुइयां, जिन्हें सात वर्ष पहले माकपा कार्यकर्ताओं के लाठी भांजने के कारण अपनी धोती पकड़कर भागना पड़ा था, आज माकपा के प्रदेश सचिव सूर्यकांत मिश्र के साथ, जिन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता है, मंच साझा कर रहे हैं। जाहिर है, यह कांग्रेस के लिए 'मरता क्या न करता' वाली स्थिति है।
यदि कांग्रेस-वाम गठबंधन को अच्छी सीटें मिलती हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर 2019 में मोदी सरकार के खिलाफ यह विपक्षी एकता के केंद्र में रहेगा। बंगाल के चुनावी नतीजे का असर नरेंद्र मोदी सरकार पर भी पड़ेगा, क्योंकि अगर भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है, तो राज्यसभा में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा।
यदि ममता बनर्जी 170 से ज्यादा सीटें जीतती हैं, तो पार्टी में उनकी तूती बोलेगी और वह फिर से मजबूती से राज्य में शासन करेंगी। लेकिन 160-165 सीटों के साथ मुश्किल से बहुमत का आंकड़ा पार करने पर ममता को केंद्र का और ज्यादा मोहताज होना पड़ेगा और अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखना उनके लिए मुश्किल होगा। वैसे में राज्य विधानसभा में भी उन्हें विपक्ष की आक्रामकता और पार्टी के भीतर भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।