उसने लिखा –'मैं इंजीनियर बनना नहीं चाहती थी। मैं साइंस पढ़कर नासा में जाना चाहती थी। लेकिन आप लोग चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं। पर मैं शायद आपकी इच्छाओं को पूरा न कर सकूं। मेरे जाने के बाद आप मेरे छोटे भाई पर कोई दबाव न डालें।' फिर उसने फांसी लगाई और मर गई। वह इस बात से परेशान थी कि अगर वह आईआईटी में न चुनी जा सकी, तो माता पिता की आशाएं तो पूरी होंगी ही नहीं । उन्होंने कोटा भेजकर जो खर्चा किया है, उसका क्या होगा। लेकिन जब आईआईटी में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा के पहले दौर का रिजल्ट आया तो वह चुनी गई थी। उसके एक सौ चालीस नंबर आए थे, जबकि कट आफ सिर्फ सौ अंको का था। एक बच्ची फेल होने के डर से मर गई। दूसरी बच्ची ने फांसी लगाने से पहले लिखा मेरी आंखें दान कर देना। वह भी फेल हो गई थी। तीसरी ने कहा- पापा मैं मैथ्स में रह गई और मर गई।
आखिर बच्चियों पर पढ़ाई विपत्ति की तरह क्यों टूट रही है। वे माता-पिता की आशाओं के दबाव और उन आशाओं से पैदा होने वाली निराशाओं को नहीं झेल पा रही हैं। और सिर्फ बच्चियां ही क्यों, लड़के भी जिंदगी की मुसीबतों से परेशान होकर जान गंवा रहे हैं। इंजीनियरिंग और मेडिकल कोचिंग के हब बने कोटा में पिछले पांच सालों में पचास बच्चों ने इसी तरह जान गंवाई है।
पढ़कर बच्चे सफल ही न हों, अपने आसपास वालों को पछाड़ दें, सब से आगे निकल जाएं। इस सबसे आगे निकल जाने में ही बच्चों की मुसीबतें छिपी हुई हैं। क्यों ऐसा है कि वे अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकते या कोई उनकी बात समझता नहीं। यह दिलासा नहीं मिलती कि कोई बात नहीं, इस बार सफल नहीं हो सके, तो अगली बार सफल हो जाओगे। इंजीनियर न सही कुछ और बन जाओगे। जीवन में एक रास्ता बंद होता है, तो दूसरे सैकड़ों रास्ते खुल सकते हैं। अंगरेजी की कहावत है न कि देअर इज ऑलवेज ए वे इन एवरी इमर्जेंसी।
हाल ही में जब सिविल सर्विसेज का रिजल्ट आया था, तो बाईस साल की टीना डाबीने पहली बार में ही टॉप किया। यह एक अभूतपूर्व उपलब्धि है। मगर यदि यूपीएससी की कुल पद्धति को देखें, तो लगभग साढ़े चार लाख बच्चों ने प्रिलिम्स की परीक्षा दी थी। पंद्रह हजार बच्चों ने प्रिलिम्स पास किया। इन पंद्रह हजार में से सिर्फ तीन हजार मेंस में चुने गए। इन तीन हजार में से भी इंटरव्यू के बाद एक हजार दस बच्चे ही सफल कहलाए। जरा हिसाब लगाएं कि एक सफल बच्चे के पीछे कितने हजार असफल बच्चे खड़े हुए हैं। उनकी मुसीबतों और निराशाओं का कोई अंत नहीं। बहुत से बच्चे तो इतने निराश हो जाते हैं कि जीवन की आशा ही छोड़ देते हैं। कई पागल हो जाते हैं और कई जीवन समाप्त कर लेते हैं।
सफलता की पूजक इस दुनिया में विफल की कोई जगह नहीं। और सफलता का मानक यही है कि पढ़-लिखकर आपको कितने लाख-करोड़ का पैकेज मिलता है। अक्सर काउंसलर्स कहते हैं कि बच्चों पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। मगर जीवन की परिस्थितियां बच्चों को किसी और तरफ ही धकेलती हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि हमारे यहां दाखिले की चाहत रखने वाले लाखों हैं, मगर सीटें कम हैं। यही हाल नौकरियों का है। अवसर की असमानता बच्चों को कठोर फैसले लेने के लिए मजबूर करती है। फिर आसपास के किसी बच्चे या दोस्त, सहेली की सफलता दूसरे बच्चों की राह में जैसे बाधा की तरह खड़ी हो जाती है। हमारे बच्चे इस तरह जान न गंवाएं, इस तरफ सबको सोचना होगा।