लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था को चुनौती देते इन चुनावों के बाद ध्रुवीकृत अमेरिका और भी अधिक ध्रुवीकृत होता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर अपनी विजयी वापसी के पहले दस महीनों में ट्रंप डेमोक्रेटिक पार्टी के अपने प्रतिद्वंद्वियों से मिली पहली गंभीर चुनौती में नाकाम रहे हैं, जिन्होंने न्यू जर्सी और वर्जीनिया में भी गवर्नर पदों के चुनाव जीते हैं। ट्रंप और उनकी पार्टी ने देश की अर्थव्यवस्था के लंबे समय से बंद रहने को इसका जिम्मेदार बताया है, जिसकी वजह से उनका प्रशासन न तो खर्च कर सकता है और न ही अपने कर्मचारियों को वेतन दे सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि चुनावी नतीजे जनता के असंतोष को ही दर्शाते हैं।
34 वर्ष की उम्र में न्यूयॉर्क के सबसे युवा मेयर बनने जा रहे ममदानी के साथ उनका मुकाबला पीढ़ीगत और वैचारिक, दोनों था। ट्रंप ने उन्हें 'कुछ हद तक कम्युनिस्ट' कहा और न्यूयॉर्क के सभी मतदाताओं को चेतावनी भी दी थी कि अगर ममदानी जीते, तो वह शहर के लिए धन रोक सकते हैं। मतदान के दिन, उन्होंने घोटालों में फंसे न्यूयॉर्क के पूर्व गवर्नर एंड्रयू कुओमो का आधिकारिक रूप से समर्थन करके रिपब्लिकन पार्टी के अपने उम्मीदवार की बलि चढ़ा दी। मतदाताओं से स्लिवा पर वोट बर्बाद न करने का आग्रह करते हुए, उन्होंने कुओमो को तरजीह दी, जो एक डेमोक्रेट हैं और पार्टी प्राइमरी में ममदानी से हार चुके हैं। वह शायद ममदानी के वोट काटने के लिए, एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतरे थे। ममदानी पर अपशब्दों की बौछार की गई। अरबपति एलन मस्क ने उन्हें 'ममदुमी या जो भी उनका नाम हो' कहकर मजाक उड़ाया। लेकिन, ममदानी, जो एक वर्ष पहले तक एक अनजान राज्य विधानसभा सदस्य थे, ने एक जोशीला अभियान चलाया, जिसमें बॉलीवुड के संवादों का इस्तेमाल, तो शाहरुख खान की शैली में बांहें फैलाकर अपील की गई। उन्होंने न्यूयॉर्क के एक मजदूर वर्ग के बड़े हिस्से व प्रवासियों को आकर्षित करने के लिए स्पेनिश, अरबी, बंगाली, उर्दू, स्वाहिली व दूसरी भाषाओं का भरपूर इस्तेमाल किया। यहूदी विरोधी रुख के बावजूद हिस्पैनिक, लैटिनो और यहां तक कि गरीब यहूदियों ने भी उन्हें वोट दिया।
उन्होंने न्यूयॉर्क की सड़कों, मॉल और ड्राइव-वे पर घूम-घूमकर सभी वर्गों के लोगों से समर्थन मांगा। उन्होंने चुनाव प्रचार में सबसे आगे रहते हुए सिर्फ एक कार्डबोर्ड प्लेकार्ड, जिस पर लिखा था 'आइए, चुनाव पर चर्चा करें' और हाथ में माइक लेकर, भीड़ को संबोधित करते हुए, उनका उत्साह बढ़ाते हुए, अपनी जीत की मुस्कान बिखेरी। उनके प्रतिद्वंद्वी उनकी विजयी मुस्कान के आगे थके हुए लग रहे थे और सिर्फ अपने अनुभव के नाम पर उनको घेरने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वे भूल गए कि ममदानी एक हाउसिंग काउंसलर की तरह गरीबों को किफायती आवास दिलाने में मदद कर रहे थे। दुनिया की आर्थिक राजधानी में, जहां अरबपति रहते हैं, ममदानी ने उन लोगों का एक बड़ा समूह तैयार किया, जो अमीर नहीं हैं। न्यूयॉर्क, जो अमेरिका का सबसे बड़ा शहर होने के साथ ज्ञान और बेहतर जीवन के आकांक्षी लोगों को आकर्षित करता है, का यह चुनाव एक वैश्विक घटना की तरह हो गया था। ममदानी की उपस्थिति ने एशिया और अफ्रीका (उनके भारतीय/युगांडाई वंश), मुस्लिम जगत तथा उन सभी लोगों को आकर्षित किया, जो ट्रंप के दुनिया पर हावी होने के तरीकों से परेशान थे। इस दौरान सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व ढंग से विभाजनकारी बहसें चलीं, मानों धर्मयुद्ध का युग लौट आया हो।
ममदानी का समर्थन और विरोध, दोनों ही ध्रुवीकरण कर रहे थे। जो लोग समर्थन कर रहे थे, वे इस्लामोफोबिया का विरोध कर रहे थे और इसे यथास्थिति के खिलाफ विद्रोह बता रहे थे। साथ ही, जो लोग विरोध में थे, वे चाहते थे कि हर मुसलमान पश्चिम छोड़ दे और 'जहां से आया है, वहीं लौट जाए। रूढ़िवादी अमेरिकियों के लिए, न्यूयॉर्क, लंदन, जो कि एक और विश्व राजधानी है, के नक्शेकदम पर चल रहा था, जहां एक मुसलमान सादिक खान है, जिसे ट्रंप नापसंद करते हैं।
न्यूयॉर्क को अमेरिका के अमीरों का घर कहा जाता है, जहां माना जाता है कि 3,50,000 करोड़पति रहते हैं, के लिए चुनावों के रुझान डरावने थे। फोब्र्स पत्रिका के अनुसार, कम से कम 26 अरबपतियों ने ममदानी को रोकने की कोशिश में 2.2 करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च कर दिए। इनमें दो ऐसे भी थे, जिन्होंने पहले उनका समर्थन किया था, लेकिन बाद में पाला बदल लिया। माइक ब्लूमबर्ग ने कुओमो का समर्थन करने वाले एक समूह को 15 लाख डॉलर का और दान दिया। हालांकि, अपनी सभी कथित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बावजूद, वह अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि वह अमेरिकी मूल के नहीं हैं।
न्यूयॉर्क दुनिया के सबसे बड़े शहरी समूहों में से एक है और अमेरिका के बाहर जन्मे 32 लाख से अधिक निवासियों का घर है, जो 2016 तक दुनिया के किसी भी शहर की सबसे बड़ी विदेशी मूल की आबादी है। 65 लाख की आबादी के साथ, वे कुल अमेरिकी आबादी का 1.95 फीसदी (2023 के आंकड़े) हैं। अमेरिकी जनगणना के अनुसार, 2000 और 2018 के बीच, भारतीय-अमेरिकी आबादी में लगभग 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2015 में उनकी औसत आय एक लाख डॉलर थी। इस बढ़ती वास्तविकता के साथ, आने वाले वर्षों में अमेरिका के सार्वजनिक जीवन में दक्षिण एशियाई लोगों की भागीदारी बढ़ना तय है।