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बेहतर कार्यसंस्कृति का आधार बने योग

Sun, 21 Jun 2015 06:05 PM IST
उदय प्रकाश अरोड़ा
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पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले के एक छोटे शहर का नाम है तक्षशिला। कभी इसकी गणना दुनिया के जाने-माने नगरों में की जाती थी। तक्षशिला सैकड़ों वर्षों तक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक क्रिया कलापों का केंद्र था। किंतु जिस विषय को लेकर तक्षशिला की ख्याति सारे संसार में फैली, वह थी भारतीय योग विद्या। तक्षशिला से भारत और पश्चिमवासियों को योग विद्या के विषय में पता चला। महर्षि पतंजलि ने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त करने के बाद योग को सारे भारत में फैलाया। भारत में पश्चिम वासियों का प्रवेश सिकंदर के माध्यम से मुख्यतः यूनान से हुआ था।
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सिकंदर जब तक्षशिला पहुंचा, तो उसे पता चला कि नगर के बाहर नग्नावस्था में कुछ योगी दार्शनिक निवास करते हैं, जिनका समाज में बड़ा सम्मान था। सिकंदर ने अपने एक वरिष्ठ सहयोगी ओनेसिक्रीतोस को उन योगियों के विषय में जानकारी हासिल करने के लिए भेजा। ओनोसिक्रीतोस ने देखा कि वहां 15 योगी विभिन्न आसन मुद्राओं में थे। कोई सिर नीचे पैर ऊपर, कोई एक पैर के बल पर खड़ा तथा कोई दोनों पैर ऊपर उठाए लेटा हुआ था। भारतीय योगियों को ओनोसिक्रीतोस से सुकरात, पाइथागोरस और डायोगिनीस के विषय में पता चला। उन्होंने यूनानियों को विद्वान और संतुलित बुद्धि वाला तो स्वीकार किया, किंतु उनकी भौतिक जीवन पद्धति को अपने विचारों के बिल्कुल विपरीत देखा। ओनेसिक्रीतोस ने उन योगियों के प्रमुख से कहा कि यदि वह सिकंदर की आज्ञा मानकर उससे मिलने के लिए राजी हो जाता है, तो सम्राट प्रसन्न होकर उसे बहुमूल्य वस्तुएं उपहार में देगा, तथा न मानने पर कठोर दंड दे सकता है। सिकंदर को जब पता चला कि योगी मिलने के लिए राजी नहीं है, तो उसे बुरा नहीं लगा, बल्कि भारतीय योगी की उसने प्रशंसा की।

200 ई.पू. के लगभग कुछ हेर-फेर कर प्लूटार्क ने इसी घटना के विषय में इस तरह लिखा कि सिकंदर एक भारतीय राज्य सम्बोस पहुंचा, जहां के नग्न योगी आक्रमणकारियों के विरुद्ध जनता को भड़का रहे थे। सिकंदर ने उनमें से 10 को पकड़ लिया। यह शर्त रखी गई कि प्रत्येक से एक प्रश्न पूछा जाएगा, तथा जो सही उत्तर देने में विफल रहेगा, वह मृत्युदंड का भागी होगा। योगियों के उत्तर से प्रभावित सिकंदर ने उन्हें उपहार देकर मुक्त कर दिया। यह कथा धीरे-धीरे इतनी लोकप्रिय होने लगी कि विभिन्न भाषाओं में इसका अनुवाद किया जाने लगा। सर्वत्र एक ही उद्देश्य था कि भारतीय योगियों की तपश्चर्या, त्याग और संन्यास की महत्ता को सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा और पश्चिमी संसार के उपभोगवाद के ऊपर प्रतिष्ठापित करना। यानी भारतीय योग को आज जो विदेश में सम्मान मिल रहा है, वह नई चीज नहीं है। आधुनिक युग में सर्वप्रथम विवेकानंद के प्रयत्नों से पश्चिम में योग का प्रसार प्रारंभ हुआ।
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योग वस्तुतः एक दर्शन है। ‘युज्’ धातु से बना योग का शाब्दिक अर्थ है जुड़ना। योग उन विभिन्न मार्गों को स्पष्ट करता है, जिससे जुड़कर व्यक्ति ईश्वर से अपनी एकात्मकता स्थापित कर सकता है। मार्गों के आधार पर योग का विभाजन मुख्यतः चार प्रकार के योगों में किया गया है-ज्ञानयोग, भक्ति या प्रेमयोग, कर्मयोग तथा राजयोग।

इन सब से अलग है हठयोग। इसका उद्देश्य है शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ और निरोग बनाना। जनता में जो योग प्रचलित हो गया है, वह हठयोग ही है। विभिन्न शारीरिक आसन और मुद्राएं इसी योग के के क्षेत्र में आती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब तक शरीर स्वस्थ नहीं, आध्यात्मिक विकास भी संभव नहीं। प्रसन्नता की बात है कि भारत के प्रयत्नों के कारण संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिवर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए स्वीकार कर लिया है। 21 जून का दिन इसलिए चुना गया, क्योकि उत्तरी गोलार्द्ध में यह सबसे बड़ा दिन है। योग संपूर्ण मानवता की विरासत है। चिकित्सा शास्त्र, सर्जरी, गणित, व्याकरण, नक्षत्र विज्ञान आदि विषयों में हमने विश्व को बहुत कुछ दिया है। किंतु आज ज्ञान के इन सभी क्षेत्रों में अपने परिश्रम के कारण पश्चिम हमसे बहुत आगे हो गया है। जिस तेजी से वहां योग केंद्रों की निरंतर संख्या बढ़ रही है, उस आधार पर यह संभव लगता है कि योगविद्या के विकास में भी पश्चिम हमसे बहुत आगे निकल जाए। भारत में यदि कर्म की संस्कृति को विकसित करना है, तो हमें योग को अपना आधार बनाना पड़ेगा। योग का संबंध किसी विशेष धर्म से नहीं है। खुशी की बात है कि मुस्लिम समाज में स्वस्थ होने की जागरूकता के साथ-साथ योग लोकप्रिय हो रहा है। पाकिस्तान में भी योग केंद्रों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।
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