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योग और वैश्वीकरण

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योग न तो आस्था का विषय है, न अंधविश्वास का; वास्तव में यह एक सुपरिभाषित दर्शन, व्याकरण और 'समग्रता' पर आधारित लक्ष्य का एक विषय है। यह भारत की विश्व दृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है और व्यक्तित्व को अस्तित्व के सभी स्तरों के साथ एकात्म करने की चेष्टा करता है। यह यथार्थ या ब्रह्मांड के पूर्व विचारित  सिद्धांतों के स्थान पर स्वयं ही सारी चीजों तक पहुंचने का प्रयास है। भारत के लिए, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का अर्थ है, वैश्वीकृत हो चुकी दुनिया द्वारा भारत की ओर से मानवता को दिए गए सर्वश्रेष्ठ उपहार के रूप में योग को मान्यता देने के अवसर का उत्सव मनाना। तुर्कमेनिस्तान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसी वर्ष जुलाई में एक योग केंद्र का उद्घाटन योग की बढ़ती स्वीकार्यता की ओर संकेत करने वाली एक और घटना थी। मोटे तौर पर मुक्त व्यापार की बाधाओं की समाप्ति और पूंजी, वस्तुओं तथा सेवाओं के मुक्त प्रवाह से चिन्हित वैश्वीकरण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के ज्यादा नजदीकी एकीकरण का प्रयास करता है। उसका एक दर्शन है, संस्थाएं हैं और उसके लक्ष्य का मूल 'न्यूनीकरणवाद' या 'वैज्ञानिक तार्किकतावाद' में है। दो नितांत भिन्न विश्व दृष्टियों का इस तरह एक साथ आना एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। इसके लिए, आपको दोनों विश्व दृष्टियों के मूलभूत तत्वों को समझना होगा।
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पश्चिमी मानस पर पिछली तीन शताब्दियों से हावी वैज्ञानिक तार्किकतावाद की आधारशिला गैलीलियो गैलिली, फ्रांसिस बेकन, रेने डेस्कार्टेस और आइजक न्यूटन ने रखी थी। डेस्कार्टेस के कथन 'कोगिटो अर्गो सम' (मेरा अस्तित्व है, क्योंकि मैं सोचता हूं) का परिणाम एक विखंडित मानवीय व्यक्तित्व में निकला, जिसमें 'मस्तिष्क' 'शरीर' से पृथक था, और शरीर के एक नियंत्रक निकाय के रूप में कार्य कर रहा था। पदार्थ के यांत्रिक दृष्टिकोण को जीवित प्राणियों पर भी लागू करके डेस्कार्टेस ने यह भी कहा था कि 'मैं मानव शरीर को एक मशीन समझता हूं।' न्यूनीकरणवादी विश्वदृष्टि पर आधारित विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति ने मानव समाज को पूरी तरह से बदल देने में और विकराल समृद्धि और हतप्रभ कर देने वाले उपभोग के स्तरों का निर्माण करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आप इसके साथ-साथ अपूरणीय प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र ह्रास, गंभीर पर्यावरणीय पतन और मौसम परिवर्तन और लगातार चौड़ी होती आर्थिक खाई भी पाते हैं, जिनका परिणाम गंभीर वैश्विक असंतुलन और खलबली में निकला है और जो विश्व शांति के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर रही है।

राष्ट्रों के बीच और राष्ट्रों के भीतर बढ़ती असमानता के संबंध में जोसेफ स्टिग्लिट्ज ने अपने अत्यंत प्रभावशाली शोध 'ग्लोबलाइजेशन ऐंड इट्ज डिसकंटेन्ट्स' में 2001 में गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने तर्क दिया है कि 'ग्लोबलाइजेशन आज कारगर नहीं रहा है। यह कई गरीबों के लिए कारगर नहीं रहा है। यह पर्यावरण के लिए कारगर नहीं रहा है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए कारगर नहीं रहा है।' स्पष्ट तौर पर इसने 'ग्लोबलाइजेशन' के मूलभूत तत्वों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
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इसी प्रकार की चिंता विश्व बैंक समूह के तत्कालीन अध्यक्ष जेम्स डी. वॉल्फेनसॉन ने 2003 में दिए एक भाषण में व्यक्त की थी, उन्होंने कहा था- '... हमें उन मूलभूत शक्तियों से निश्चित ही निपटना होगा, जो हमारे विश्व को गढ़ रही हैं। कई मायनों में, ये वे शक्तियां हैं, जिन्होंने असंतुलनों को जन्म दिया है।' उन्होंने कहा-'हमारी धरती संतुलित नहीं है। बहुत थोड़े से लोगों का बहुत ज्यादा नियंत्रण है। और बहुत सारे लोगों के पास उम्मीद करने के लिए भी बहुत कम है-बहुत ज्यादा खलबली है, बहुत ज्यादा युद्ध हैं, बहुत ज्यादा कष्ट हैं।' उन्होंने कहा-हम गरीबी से संघर्ष करने के लिए आगे बढ़ें, समानता स्थापित करने के लिए और अगली पीढ़ी के लिए शांति सुनिश्चित करने के लिए बढ़ें।' संतुलन स्थापित करने के लिए अथवा समानता स्थापित करने और एक शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण करने के लिए कोई ठोस सकारात्मक संचलन पिछले एक दशक में नजर नहीं आया है। वास्तव में विश्व के विभिन्न गिस्सों में हुई हाल की घटनाएं जैसा दर्शाती हैं, आज का विश्व ज्यादा हिंसक है, ज्यादा असमानतापूर्ण है, ज्यादा अशांत है और ज्यादा विभाजित है। क्या योग समानता वापस लाने में और अशांति और कष्ट कम करने में कुछ सकारात्मक योगदान दे सकता है?

एक अत्यंत भिन्न स्थिति तब एक बार और बनी, जब 'जीवन' को आणविक जीवविज्ञान के तौर पर समझने की चेष्टा की गई। जाने- माने परमाणु जीवविज्ञानी और नोबल पुरस्कार विजेता फ्रांसिस क्रिक ने आश्चर्य जताया है कि छह दशक और उससे भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद हम यह नहीं समझ सके हैं कि कैसे कोई चोटग्रस्त जीवधारी ठीक उसी ढांचे में फिर विकसित हो जाता है, जैसा कि वह पहले था। यह कशमकश इस कारण पैदा होती है, क्योंकि आमतौर पर परमाणु जीवविज्ञानी विश्वास करते हैं कि संपूर्ण जीवन और मस्तिष्क को डीएनए अणुओं के ढांचे और कार्य के आधार पर समझा जा सकता है। क्या 'समग्रवाद' इस दुविधा को सुलझाने में मददगार हो सकता है?

मानवीय सभ्यता की बिल्कुल शुरुआत से ही भारतीय मानस ने ब्रह्मांड और हमारे चारों तरफ के भौतिक विश्व की प्रकृति पर और उनके परस्पर संबंधों पर विचार किया है। इन विचारकों ने समूची ब्रह्मांडीय घटनाओं की मूलभूत एकता की खोज की थी। उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि इस परिवर्तनशील भौतिक जगत के पीछे एक अमर, अपरिवर्तनशील सत्य है, जिसे ब्रह्मांडीय अंतरचेतना या ब्रह्मांडीय आत्म है, जो समस्त जगत में व्याप्त है और भौतिक जगत की प्रत्येक वस्तु इस ब्रह्मांडीय अंतरचेतना की अभिव्यक्ति है। यह संभवतः ब्रह्मांड की समग्र दृष्टि का प्रथम प्रतिपादन था।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, ब्रह्मांड एक होलोग्राम है, जिसका प्रत्येक कण संपूर्ण है। इस समग्र दृष्टिकोण में, चेतन तत्व इस ब्रह्माण्ड का एक मूलभूत तत्व है। भौतिक विश्व की रचना इस ढंग से हुई है कि “संपूर्ण” इसके प्रत्येक अंश में है, जो इसी तरह से स्वयं में संपूर्ण को समेटा होता है। दूसरे शब्दों में, जो वृहद ब्रह्मांड में है, वही सूक्ष्म ब्रह्मांड में है। इस दृष्टिकोण में मानव व्यक्तित्व मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा के निरंतर संपर्क का सातत्य है-जिनमें कोई किसी और से श्रेष्ठ नहीं होता। बुद्धि और पदार्थ का द्वैत समाप्त हो जाता है और यही स्थिति ‘प्रकृति’ पर हावी होने अथवा उसका शोषण करने की होती है। इस प्रकार समग्रतावादी दृष्टिकोण इस जरूरत को रेखांकित करता है कि मनुष्य को पर्यावरण के साथ शांति व सद्भाव से रहना सीखना होगा। इस प्रकार, जीवन और उसकी समस्याओं को सिर्फ समग्रता में देखा जा सकता है, उन्हें टुकड़ों में विभाजित करके नहीं।
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