पंजाब के भीतरी इलाकों में करीब 700 किलोमीटर की यात्रा करने और सड़क किनारे तथा पिंडों (गांवों) में लोगों से बात करने पर एक बात जो स्पष्ट तौर पर दिखी, वह यह कि पंजाब में इस बार चुनाव में परिवर्तन की बयार बह रही है। वहां मैंने किसी भी राजनेता से बात नहीं की, सिर्फ लोगों से बात की, ताकि उनके रुझान जान सकूं।
इस बार वहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी (आप) के बीच है। अकाली-भाजपा गठबंधन को व्यापक रूप से सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ रहा है। पहली बार एक तीसरी ताकत ने राज्य की मुख्यधारा की पार्टियों के सामने ऐसी कठिन चुनौती पेश की है, अन्यथा वही दल बारी-बारी से सत्ता में वापसी करते थे, सिर्फ 2012 को छोड़कर, जब अकाली दल को दूसरा कार्यकाल मिला था। पारंपरिक समझदारी तो यही कहती है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह बाजी मार ले जाएंगे, क्योंकि कांग्रेस पुरानी पार्टी है, जिसे राज-काज का अनुभव है, और मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की घोषणा से प्रचार के अंतिम चरण में कांग्रेस को मदद मिली है।
लेकिन (और यह 'लेकिन' बहुत बड़ा है) आप की स्थिति भी कमजोर नहीं है। यह अप्रत्याशित रूप से 'डार्क हॉर्स' बनकर उभर सकती है और अंततः पंजाब की सत्ता हासिल कर सकती है। हालांकि दिल्ली की घटनाओं के कारण हाल के हफ्तों में केजरीवाल की पार्टी के कमजोर पड़ने की चर्चा भी हो रही थी, जिसमें पार्टी के राज्य प्रमुख सुच्चा सिंह छोटेपुर के निष्कासन, मुख्यमंत्री पद के स्पष्ट प्रत्याशी का अभाव और पार्टी पर बाहरी होने का ठप्पा प्रमुख है। लेकिन पंजाब में मैंने जो देखा, उससे इन बातों की पुष्टि नहीं होती।
'कांटे की टक्कर' को देखते हुए कई लोगों का मानना है कि चुनाव के नतीजे गुप्त (मौन) मतदाताओं द्वारा निर्धारित होंगे। संभवतः यह पहली बार है कि पंजाब के मतदाता इतने चुप हैं। कांग्रेस और आप के बीच विभाजन स्पष्ट तौर पर युवा-बुजुर्ग तथा गरीब-अमीर की लाइन पर था। युवा और प्रौढ़ उम्र के मतदाता जहां आप का समर्थन कर रहे हैं, वहीं बुजुर्ग मतदाता कांग्रेस और कैप्टन के पक्ष में हैं। यदि आप किनारे ले जाकर रेहड़ी वाले, मोची, चाय दुकानदार, ग्रामीण दलित समेत मजहबी सिखों से बातें करें, तो निरपवाद रूप से वे आप समर्थक मिलेंगे। उनमें से कई मुश्किल से ही अपनी राय रखते हैं।
ज्यादातर युवा मुझे आप समर्थक प्रतीत हुए, हालांकि पटियाला में कई लोगों को कैप्टन अमरिंदर सिंह की जीत से कोई परेशानी नहीं थी। एक ढाबा मालिक ने कहा, जीत जाएंगे, उनको कौन हराने वाला पैदा हुआ है, बेमिसाल लोकप्रिय हस्ती हैं। लेकिन उससे कुछ ही दूरी पर दो कॉलेज छात्राओं ने कहा कि वे आप को वोट देंगी। जब उनसे पूछा कि उनके अभिभावक किसे वोट देंगे, तो उन्होंने बताया कि वे कांग्रेस को वोट देंगे। वहीं बुजुर्गों का कहना था, बच्चे हमारे मानते नहीं, वे आप के चक्कर में आ गए हैं।
यह सिर्फ मालवा क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि दोआबा में भी सच था। कुछ हद तक ट्रंप और ब्रेग्जिट के चुनाव जैसी स्थिति थी, जहां युवा सत्ता विरोधी, व्यवस्था विरोधी थे, जो नतीजे के बारे में सोचने के लिए तैयार नहीं थे। वे चाहते हैं कि आप को एक मौका मिले। जो कांग्रेस के पक्ष में हैं, वे भी परिवर्तन चाहते हैं और मानते हैं कि कांग्रेस कम से कम शासन करने में तो सक्षम है। और वे केंद्र के साथ टकराव नहीं चाहते, जैसा कि दिल्ली में आप और केंद्र सरकार के बीच है। वे आप से इसलिए सतर्क हैं, क्योंकि उसे शासन का 'अनुभव नहीं' है और आखिरकार 'पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है', 'यदि यहां की सरकार कमजोर होगी, तो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई इसका फायदा उठाना चाहेगी।'
वरिष्ठ 'बादल साब'( प्रकाश सिंह बादल) के प्रति सम्मान का भाव होने के बावजूद अकाली दल के प्रति नाराजगी और गुस्सा स्पष्ट दिखा। भाजपा वहां मुख्य मुकाबले में नहीं है। नोटबंदी से पंजाब के लोगों को भी परेशानी हुई, लेकिन वह चुनाव में मुद्दा नहीं है। लोग बड़े पैमाने पर अकालियों के भ्रष्टाचार और लूट, ड्रग समस्या की बातें करते हैं। होशियारपुर जिले के एक गांव में लोगों ने बताया कि यदि एक हजार लोगों में से पांच सौ युवा हैं, तो उनमे से 350 किसी न किसी रूप में ड्रग की समस्या से प्रभावित होंगे। पंजाब में 18 से 39 वर्ष के युवाओं की आबादी 53 फीसदी है। हैरानी की बात है कि लोगों के मन में नरेंद्र मोदी के प्रति कोई बुरा भाव नहीं है। कुछ लोग उन्हें 'बढ़िया आदमी' कहते हैं, लेकिन कहते हैं कि 'अकालियों ने बेड़ा गरक कर दित्ता है।'
मौजूदा हालात को देखते हुए चुनाव के बाद वहां चार तरह के परिदृश्य उभर सकते हैं। पहला, कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने पर कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार बनाएंगे। दूसरा, आप को स्पष्ट बहुमत मिल सकता है, पर मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह स्पष्ट नहीं है। तीसरा, त्रिशंकु विधानसभा हो सकती है, जिसके बारे में कई विशेषज्ञों का अनुमान है। अकाली दल और कांग्रेस, दोनों आप से घृणा करती है और वे आप को नवोदित राजनीतिक शक्ति मानते हैं। हाल ही में एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने निजी बातचीत में बताया कि ऐसी स्थिति में अकाली दल कांग्रेस को बाहरी समर्थन दे सकते हैं, खासकर तब, जब आप सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे। ऐसे में कांग्रेस और अकाली मिलकर बहुमत बना सकते हैं। हालांकि ऐसा फैसला करना अकालियों के लिए मुश्किल हो सकता है, क्योंकि उसका राजनीतिक चरित्र बिल्कुल कांग्रेस विरोधी है। ऐसे में चौथा विकल्प राष्ट्रपति शासन का हो सकता है, जो नरेंद्र मोदी के लिए खुशी की वजह बनेगी, क्योंकि इससे केंद्र को कुछ समय के लिए पंजाब पर शासन करने का मौका मिलेगा। लेकिन यह सब कुछ 11 मार्च को आने वाले नतीजे पर निर्भर करेगा।