एक समय ऐसा था, जब किसी खूबसूरत चीज को देखकर मुंह गोल हो जाता था और खुद ब
खुद सीटी बज उठती थी। उन दिनों सीटी के जरिये बड़े-बड़े काम हो जाते थे। कुछ
मनचलों को गृहस्थी की मंजिल इसी तरह मिल जाती थी। अलबत्ता अनेक लोग सीटी
बजाने की अपनी इस आदत के कारण कई बार मोहल्ले के बाहुबली भाइयों के हाथों
सरेआम पिट भी जाते थे। इसके बावजूद सीटी के साथ जुड़ा रोमांच कुछ ऐसा था कि
हर लड़का किशोर होते-होते सीटी बजाने की सदियों पुरानी शास्त्रीय कला में
निपुण हो जाता था।
इसी तरह सीटी बजाते-बजाते मैं जब बड़ा होने की कोशिश
कर रहा था, उन्हीं दिनों मेरे घर में एक तोता आया। मैंने उसे पढ़ाने में
अपनी पूरी प्रतिभा झोंक दी। उसके पिंजरे के नजदीक खड़ा होकर मैं ‘राम-राम’
करता। लेकिन तोता मानो कुछ सीखने को तैयार ही नहीं था। मैं उसे प्यार से
पुचकारता। खाने के लिए हरी मिर्च देता। फिर उसे बहलाने के लिए सीटी बजाता।
इसका लाभ यह हुआ कि मैं सीटी बजाने में निष्णात हो गया।
एक दिन तोते का
पिंजरा घर के बाहर गली में लगे अमरूद के पेड़ पर टंगा था, और मैं उसे
‘राम-राम’ बोलना सिखाने में मशगूल था। गली के दूसरी ओर मकान की छत पर एक
युवती अपनी भीगी केशराशि लिए खड़ी थी। मैं इस दृश्यावली से अनभिज्ञ तोते को
पढ़ाने में लगा था। तभी वातावरण में सीटी की निर्दोष ध्वनि गूंजी। मैं
सकपकाया। इधर-उधर देखा। युवती ने आग्नेय नेत्रों से मुझे घूरा। बाद में पता
चला कि वह करतूत दुष्ट तोते की थी।
मैंने तत्काल प्रभाव से तोते को सिखाना
बंद कर दिया। लेकिन मौके-बेमौके उस हठी का सीटी बजाना जारी रहा। वह समय
ही ऐसा था, जब सीटी बजाने में खतरे थे। लेकिन अब खुद सरकार को सीटी बजाने
वालों की इतनी चिंता है कि वह उनकी हिफाजत के लिए व्हिसल ब्लोअर बिल ले आई
है। काश, सीटी बजाने वालों की इतनी चिंता सरकार बीस-तीस वर्ष पहले करती! अब
इस कानून से मुझे तो कोई लाभ मिलने वाला है नहीं।