पहले आमिर खान और अब नसीरुद्दीन शाह, जैसे उनका कुछ कहना ही भारी पड़ गया। आमिर या नसीर ने यही तो कहा था कि समाज में इतनी असहिष्णुता बढ़ती जा रही है कि उन्हें अपने बच्चों के लिए डर लगता है। नसीर ने यह भी कहा कि भले ही उनकी शिक्षा–दीक्षा धार्मिक माहौल में हुई है, मगर उनकी पत्नी रत्ना पाठक एक खुले विचार वाले परिवार में पली-बढ़ी हैं। इसलिए उनके बच्चों को कोई धार्मिक शिक्षा नहीं मिली। अगर उनके बच्चों से कोई उनके धर्म के बारे में पूछने लगे, तो वे क्या बताएंगे!
उन्होंने यह भी कहा कि इन दिनों आदमी के मुकाबले गाय की कीमत ज्यादा है। आखिर नसीर ने ऐसा क्या गलत कहा? हर रोज ही हम भीड़तंत्र का न्याय देख रहे हैं। सिर्फ शक के आधार पर किसी की जान ले लेना, किस लोकतंत्र का न्याय है? भीड़ की हिंसा में अपराधियों की शिनाख्त तक करना मुश्किल होता है, क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। पुलिस-अदालत से अलग अगर लोग सड़क चलते न्याय करने लगें, तो सिर्फ नसीर या आमिर ही नहीं, कोई भी सुरक्षित नहीं है।
हम सभी को अपने–अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता होती ही है। बच्चे देर से लौटें, किसी मुसीबत में फंस जाएं, किसी अपराधी का शिकार हो जाएं और हम डरने लगें, तो इसमें ऐसी क्या नई और गलत बात है! इसी डर को व्यक्त किया नसीर ने तो लोग उन्हें कराची का टिकट भेजने लगे और पाकिस्तान जाने की सलाह देने लगे। यही नहीं, किसी ने फेसबुक पर लिखा कि यह 'लव जिहाद' का मामला है। नसीर की पत्नी हिंदू हैं। क्या शादी-विवाह भी लोग अब भीड़ से मंजूरी लेकर किया करेंगे? एक तरफ निजता की वकालत और दूसरी तरफ उसका हनन, जो कि तर्क से कोसों दूर हो।
नसीरुद्दीन शाह ने कहा भी कि आखिर उसने ऐसा क्या कह दिया कि उसे गद्दार कहा जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह मेरा देश है, इससे मैं प्यार करता हूं, इसलिए अपनी चिंता बताई।
अफसोस की बात यह है कि नसीर जैसे बड़े कलाकार को इस तरह प्रताड़ित किया जा रहा है। कल तो लोग रहीम, रसखान, गालिब, साहिर, राही मासूम रजा, इस्मत चुगताई, कैफी आजमी की देशभक्ति का प्रमाण मांगेंगे। और प्रमाण कौन मांगेगा, भीड़ में शामिल वे लोग, जिन्हें सिर्फ हिंसा और हुल्लड़ के जरिये अपनी ताकत दिखानी है। कला के सभी क्षेत्र के लोग समाज में हो रही ज्यादतियों के खिलाफ अपना मत प्रकट करते हैं। वे ही रचनाएं जीवित भी रहती हैं। सत्ता की तारीफ में लिखी कोई रचना, फिल्म न कभी अच्छी मानी जाती है, न पाठकों-दर्शकों के मन में अपनी जगह बनाती है।
वैसे भी इस देश के सत्तरह-अट्ठारह करोड़ मुसलमान क्या भारतीय नागरिक नहीं हैं? उन्हें पाकिस्तान चले जाने की सलाह देने का अधिकार किसी को कैसे है? वे भी यहीं पले-बढ़े हैं, उतने ही भारतीय हैं, जितना कि कोई और। यह तो लगभग उसी परिपाटी को आगे बढ़ाना होगा, जैसा पाकिस्तान या बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ किया जाता है। बांग्लादेश से तसलीमा नसरीन को इसलिए भगा दिया गया कि बाबरी मस्जिद टूट जाने के बाद वहां हिंदुओं पर हुए अत्याचार के खिलाफ उन्होंने लज्जा नाम का उपन्यास लिखा था।
लेकिन तसलीमा इतनी साहसी हैं कि वह आज तक कट्टरपंथियों के आगे नहीं झुकीं, न ही उनके विचार बदले, जबकि जान का खतरा आज तक उन पर मंडराता है। हमें बांग्लादेश या पाकिस्तान की नकल क्यों करनी चाहिए? या कि उस कहावत को सही साबित करना है कि जिनसे हम नफरत करते हैं, बिल्कुल उन जैसे ही बन जाना चाहते हैं!