क्या भविष्य में पुस्तकों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा और ई-बुक्स ही रह जाएंगी? क्या छपे हुए पन्नों का कोई स्थान नहीं रह जाएगा? एक दशक से ऐसे सवालों का सामना करते हुए भी जब कहीं किसी पुस्तक मेले की बात होती है तो एक सवाल सहज ढंग से उभरता है कि पुस्तक मेले में आखिर जाता कौन है और कौन खरीदता है किताबें?
इस बार भी 14 से 22 फरवरी तक चलने वाले विश्व पुस्तक मेले में ऐसी बातें उठेंगी। हिंदी के प्रकाशक खऱीद न होने की बात कहेंगे। पाठक बढ़ती कीमतों की बात करेंगे। आंकड़े बताएंगे कि अंग्रेजी किताबों का एक बहुत बड़ा बाजार भारत है। विश्व पुस्तक मेले को आयोजित करने वाली सरकारी संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक एम ए सिकंदर कहते हैं,"कुछ भी हो जाए, किताबें थीं और हमेशा रहेंगी। भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का आयोजन 1972 में दिल्ली में ही हुआ था।
तब से अब तक बड़ी तादाद में लोगों का मेले में आना इसका प्रमाण है। इस बार विश्व पुस्तक मेले में देश-विदेश के कुल 1100 प्रकाशक हिस्सा लेंगे।" पिछली बार 21 देशों ने अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में भाग लिया था। इस बार के पुस्तक मेले में चार नए देश हंगरी, ऑस्ट्रिया, स्पेन और क्यूबा भी शामिल हो रहे हैं। मेहमान देश सिंगापुर है, तो कोरिया फोकस कंट्री होगी।
देश के 'नॉर्थ-ईस्ट' को पुस्तक मेले की थीम बनाया गया है। मेले में नार्थ ईस्ट की संस्कृति के साथ-साथ वहां के साहित्य की भी झलक देखने को मिलेगी। बुक फेयर में अलग-अलग देश के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झलक भी देखने को मिलेगी। बच्चों के लिए कार्टून डिजाइन, थियेटर वर्कशॉप समेत कई कार्यक्रम बुक फेयर में आयोजित किए जाएंगे। विकलांग और सीनियर सिटिजंस के लिए एंट्री फ्री होगी।