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कर्म में निहित है सफलता का स्वाद

Wed, 05 Jun 2013 09:56 PM IST
शिवकुमार गोयल
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सत्यवादी हरिश्चंद्र के पुत्र रोहित पिता की तरह धर्म तथा सत्य पर हमेशा अटल रहे। देवराज इंद्र भी बालक रोहित के सद्गुणों से प्रभावित हुए।
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देवराज ने रोहित को पांच वर्ष तक अपने उपदेशों में अनेक दृष्टांत देकर सदा कर्म करते रहने, आगे बढ़ने और धर्मानुसार आचरण करने की प्रेरणा दी।

देवराज इंद्र ने रोहित से कहा, श्रम से जो नहीं थका, ऐसे पुरुष को ही लक्ष्मी मिलती है। निराश होकर, आलसी बनकर बैठे व्यक्ति को पाप धर दबोचता है।

जो चलता रहता है, उसके पाप थककर सोए रहते हैं। जो निरंतर चलता रहता है, देवगण उसी पर कृपा करते हैं। इसलिए चलते रहो-चलते रहो।

इंद्र आगे कहते हैं, बैठे हुए (निराश) व्यक्ति का सौभाग्य बैठा रहता है। खड़े होकर साहस के साथ चलने वाले का सौभाग्य आगे-आगे चलने लगता है। इसलिए चलते रहो-चलते रहो।

इंद्र कहते हैं, रोहित, सोने वाले का नाम कलि है। अंगड़ाई लेने वाला द्वापर है। उठकर खड़ा होने वाला त्रेता है और चलने वाला सतयुगी। चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है। चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है। इसलिए 'चरैवेति' अर्थात चलते रहो-चलते रहो।
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उपनिषद् में प्रस्तुत देवराज इंद्र द्वारा रोहित को दिए गए उपदेशों में पांच श्लोकों का अंतिम शब्द 'चरैवेति' दिया गया है। उनके उपदेशों का सार है, निरंतर कर्म  में तत्पर रहकर आगे बढ़ते रहनेवाला व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करता है।
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