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वादों में महिलाएं: चुनावी मौसम में मुफ्त बांटने की होड़; लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिहाज से चिंताजनक

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Tue, 31 Mar 2026 10:28 AM IST

सार

उज्ज्वला, जनधन खाते, मातृत्व लाभ योजनाएं इत्यादि ने साबित किया है कि सही दिशा में दी गई सहायता महिलाओं के जीवन में ठोस बदलाव ला सकती है। लेकिन, चुनावी मौसम में मुफ्त बांटने की होड़ नीतिगत गंभीरता कम और राजनीतिक दलों की सियासी फायदा उठाने की मंशा को ही अधिक दिखाती है।
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वादों में महिलाएं - फोटो : ANI


गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल और असम में महिला मतदाताओं की संख्या निर्णायक बनी हुई है, जबकि, तमिलनाडु, केरल व पुदुचेरी में तो महिला मतदाताओं ने पुरुषों को भी पीछे छोड़ा हुआ है। जाहिर है कि इन राज्यों में सत्ता की चाबी महिलाओं के हाथ में है और राजनीतिक दल इसे भली-भांति समझते भी हैं। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार और अन्नाद्रमुक में महिला मतदाताओं के लिए किए जा रहे वादों की होड़ हो, या फिर असम सरकार का बिहू समारोह के लिए महिलाओं को चार-चार हजार रुपये देने का एलान। केरल सरकार की स्त्री सुखम योजना हो, या फिर पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना, जिसकी राशि में हाल ही में बढ़ोतरी की गई है या फिर पुदुचेरी में महिलाओं के लिए बस यात्रा मुफ्त करने का वादा।


इन सभी योजनाओं में हालांकि ‘मुफ्त’ जैसी कोई चीज नहीं होती, क्योंकि जैसा कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का 2023 का सर्वे भी कहता है कि महिलाएं अवैतनिक श्रम के जरिये देश के जीडीपी में करीब सात फीसदी का योगदान देती हैं। लेकिन, ये सभी योजनाएं जिस विचार पर टिकी हैं, उसके साथ दिक्कत यह है कि यह महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा को दरकिनार कर उन्हें महज लाभार्थी बना देता है। हमारे समाज में जहां लंबे समय तक महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक अवसरों से वंचित रखा गया हो, वहां उन्हें विशेष सहायता देना एक आवश्यक नीतिगत उपाय हो सकता है।


उज्ज्वला, जनधन खाते, मातृत्व लाभ योजनाएं इत्यादि ने साबित किया है कि सही दिशा में दी गई सहायता महिलाओं के जीवन में ठोस बदलाव ला सकती है। लेकिन, चुनावी मौसम में मुफ्त रेवड़ी बांटने की यह प्रतिस्पर्धा नीतिगत गंभीरता कम और राजनीतिक दलों की सियासी फायदा उठाने की मंशा को ही अधिक दिखाती है। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है कि सरकारी संसाधनों को मुफ्त बांटना और जन कल्याणकारी योजनाओं में इनका निवेश करना दो भिन्न बातें हैं, और इस भिन्नता का ख्याल रखा जाना चाहिए। अगर राजनीतिक दल वाकई महिलाओं का भरोसा जीतना चाहते हैं, तो उन्हें लुभावने वादों से आगे बढ़कर ठोस व दूरदर्शी नीतियां प्रस्तुत करनी होंगी, सिर्फ तभी महिला सशक्तीकरण एक नारा नहीं, बल्कि वास्तविकता बन सकेगा।
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