बुद्ध पूर्णिमा को बीते चार दिन हुए हैं, उसे भारतीय समाज में सदियों से लड़ी जा रही एक जबर्दस्त और अनोखी लड़ाई को याद करने का अवसर होना चाहिए। यह लड़ाई हमारे समाज में व्याप्त और निहित एक विशेष तरह की असमानता के विरुद्ध लड़ी जा रही है।
आर्थिक असमानता, लैंगिक असमानता, रंगभेद पर आधारित असमानता, धर्म-आधारित असमानता दुनिया भर में पाई जाती हैं, लेकिन कुछ असभ्य देशों को छोड़, इन असमानताओं को दूर करने का घोषित लक्ष्य भी हर जगह स्वीकार्य है। हमारे देश में, समानता पर आधारित संविधान के पारित होने के बावजूद, देशवासियों के बीच आज भी सबसे बड़े पैमाने पर जो समाज व्यवस्था आदर्श समझी जाती है वह है वर्ण-व्यवस्था।
यह एक ऐसी असमानता को बनाए रखती है, जिससे तब तक छुटकारा नहीं मिल सकता, जब तक कि यह व्यवस्था ही समाप्त न की जाए। जितनी प्राचीन वर्ण व्यवस्था है, उतना ही प्राचीन उसके विरुद्ध संघर्ष है। इस लड़ाई की शुरुआत राजकुमार सिद्धार्थ के गौतम बुद्ध बनने के साथ ही हुई होगी। ज्ञान हासिल करने के बाद, उन्होंने वर्ण व्यवस्था जिन दो खंभों पर टिकी है, जाति के अंतर्गत खान-पान और जाति के अंतर्गत विवाह, उनमें से एक पर जबर्दस्त प्रहार किया।
हाथ में लोहे का कटोरा लेकर, उन्होंने घर-घर का जूठन मांगकर खाया। यह कितना बड़ा और कितना साहसी कदम था, इसका आज भी हमें एहसास नहीं हो पाता, क्योंकि ऐसा करने का साहस हम जुटा नहीं पाते। लिंगभेद के खिलाफ उनकी लड़ाई थोड़ी देर से शुरू हुई। अपनी निर्दोष पत्नी और अबोध बच्चे को वह गहरी नींद में ही छोड़ आए थे। जागने पर उन पर क्या बीती होगी, इसकी कल्पना तो उनके संकल्प को ही कमजोर कर देती। उनका सबसे प्रिय शिष्य था आनंद।
उसने गुरु को टोकने की हिम्मत जुटाकर कहा कि जब आप समानता की बात करते हैं और जन्म-आधारित असमानता से मुक्ति दिलाने के लिए पुरुषों के लिए संघ के द्वार खोलते हैं, तो महिलाओं को समानता के अधिकार और संघ में प्रवेश से कैसे वंचित रख सकते है?
बुद्ध तर्क को ही सर्वमान्य मानते थे और वह भी आनंद के इस तर्क के सामने झुके और महिलाओं को भिक्षुणी बनकर संघ में शामिल होने कि अनुमति की घोषणा की। कैसी-कैसी महिलाओं ने संघ को अपने लिए दुःख और पीड़ा से मुक्ति दिलाने वाली संस्था के रूप में ग्रहण किया? राजा बिम्बिसार की रानी, खेमा जो स्वयं मगध के राजघराने की सदस्य थी, बुद्ध के प्रवचन सुनना भी नहीं चाहती थी, लेकिन जब एक बार सुना तो उनकी अनुयायी बन गई और फिर संन्यास भी लिया।
रानी सम्यावती जिनकी सौतन ने उनकी हत्या करने का प्रयास किया था और जिनकी दासी ने उन्हें बुद्ध तक पहुंचाया और दोनों ने साथ सन्यास ले लिया। उप्पलावना, जिसने जीवन में असहनीय दुःख सहे, अपने बच्चों से बिछड़ने की तकलीफ सही और, अंत में, संघ में शरण पाकर उसे अपनी पीड़ा से छुटकारा मिला। पुन्निका जो एक बड़े व्यापारी की दासी थी, जिसने एक दिन बुद्ध का प्रवचन सुना और संघ में सदस्य बनकर अपनी गुलामी से मुक्त हुई।
सदियों पहले बुद्ध ने संघ को स्थापित करके, महिलाओं के लिए एक ऐसी जगह बनाई, जहां उन्हें सम्मान, समानता और सुरक्षा का अनुभव संभव था। सामाजिक और लैंगिक असमानता की लड़ाई एक साथ लड़कर ही जीती जा सकती है। वर्ण व्यवस्था को समाप्त करके ही पूर्ण समानता की ओर बढ़ा जा सकता है।